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कविता

वर्जिन

ललित कुमार मिश्र


मैं वर्जिन हूँ
विवाह के
इतने वर्षों के पश्चात् भी
मैं वर्जिन हूँ
संतानों की
उत्पत्ति के बाद भी।

वो जो
तथाकथित प्रेम था
वो तो मिलन था
भौतिक गुणों का
और यह जो विवाह है
यह मिलन था
दो शरीरों का
मैं आज भी
वर्जिन हूँ
अनछुई
स्पर्शरहित।

मैं मात्र भौतिक गुण नहीं
मैं मात्र शरीर भी नहीं
मैं वो हूँ
जो पिता के
आदर्शों के वस्त्र में
छिपी रही
मैं वो हूँ
जो माँ के
ख्वाबों के पंख लगाये
उड़ती रही
मैं वो हूँ
जो पति की
जरूरतों में उलझी रही
मैं वो भी हूँ
जो बच्चों की
खुशियों के पीछे
दौड़ती रही।

मैं अब
वर्जिन नहीं रहना चाहती
मैं छूना चाहती हूँ
खुद को।





जब वस्त्र नहीं थे
ललित कुमार मिश्र


जिन दिनों
वस्त्र पैदा नहीं हुए थे
उन दिनों स्त्रियों को
किस प्रकार लज्जित किया जाता था?
उन्हें किस तरह से दण्डित किया जाता था?
किस तरह गिराया जाता था उन्हें
उन्हीं की नज़रों में?
क्या उन दिनों भी
वे बलात्कार का शिकार होती थीं?
क्या उन दिनों भी
नग्नता अभिशाप थी?
कैसी होती थी उन दिनों आदर्श स्त्री?

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