वर्जिन
(काव्य संग्रह)
(काव्य संग्रह)
✍
ललित कुमार मिश्र
ललित कुमार मिश्र
वर्जिन साहित्यपीठ
प्रकाशक
वर्जिन साहित्यपीठ
78ए, अजय पार्क, गली नंबर 7, नया बाजार,
नजफगढ़, नयी दिल्ली 110043
virginsahityapeeth@gmail.com; 9971275250
सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण - दिसंबर, 2018
ISBN 978-1-387-84968-0
कॉपीराइट © 2018
वर्जिन साहित्यपीठ
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वर्जिन
मैं वर्जिन हूँ
विवाह के इतने वर्षों के पश्चात् भी
मैं वर्जिन हूँ
संतानों की उत्पत्ति के बाद भी।
वो जो तथाकथित प्रेम था
वो तो मिलन था भौतिक गुणों का
और यह जो विवाह था
यह मिलन था दो शरीरों का
मैं आज भी वर्जिन हूँ
अनछुई, स्पर्शरहित।
मैं मात्र भौतिक गुण नहीं
मैं मात्र शरीर भी नहीं
मैं वो हूँ
जो पिता के आदर्शों के वस्त्र में छिपी रही
मैं वो हूँ
जो माँ के ख्वाबों के पंख लगाये उड़ती रही
मैं वो हूँ
जो पति की जरूरतों में उलझी रही
मैं वो भी हूँ
जो बच्चों की खुशियों के पीछे दौड़ती रही।
मैं अब वर्जिन नहीं रहना चाहती
मैं छूना चाहती हूँ खुद को।
प्रतीक्षा
मैंने रखे थे
कुछ ख्वाब
इन नैनों में
जिसमें बसे थे
तुम और मैं
मैं जब जब
तुम्हे यहाँ लाई
तुम जुल्फों से
उलझ जाते
गालों से लिपट जाते
अधरों में बहक जाते।
ये ख्वाब
आज भी तनहा हैं
बस गिन रहे हैं
अंतिम साँसे
तुम्हारे इंतज़ार में।
मैंने बसाया था तुम्हे
इस ह्रदय में
कितनी ही बार
तुम यहाँ आये
पर स्तूपों की
परिक्रमा कर ही
लौट गए।
इस गर्भ में
जब आया
हमारा अंश
तुम उस तक भी
कहाँ पहुंच पाये
कहाँ सुन पाये
हमारी धड़कन
बस खेलते रहे खेल
सृजन का।
क्या तुम निकल पाओगे कभी
इस देह के तिलिस्म से
और पहुँच पाओगे मुझ तक
मैं आज भी
तुम्हारी प्रतीक्षा में हूँ
भेद
मैंने
स्पर्श किया था तुम्हें
तो तुमने भी तो
स्पर्श किया था मुझे
फिर क्यों सिर्फ
मैं ही मैली हुई?
तुम्हे तो मिली सजा में
गृहस्थी की चारदीवारी
पर मुझे मिली क्यों
सिर्फ चारदीवारी?
तुम्हे मिली इज़ाज़त
नए ख्वाब बुनने की
पर मुझे मिली क्यों मोहलत
अपने ख्वाब उधेड़ने की?
तुम
नित नये रंगों में
रंगते रहे
और मेरे सभी रंग
निस-दिन रिसते रहे
इस पक्षपात का
क्या कारण है
कह सकते हो?
यह कौन सा अभिशाप है
क्या कह सकते हो?
मैं बनी पञ्च तत्व से
तो तुम भी तो
पञ्च तत्व से ही बने हो
एक मन
एक ह्रदय
तुम्हारे पास है
एक मन
एक ह्रदय
मेरे पास भी तो है
फिर......
कहीं शारीरिक बुनावट ही तो
इसका कारण नहीं?
संभवतः यही कारण होगा
क्योंकि भेद करना तो
तुम्हारी प्रकृति है
कभी रूप रंग के नाम पर
कभी जाति पाति के नाम पर
कभी क्षेत्र के नाम पर
तो कभी भाषा के नाम पर
उपनिवेश
बिंदिया, सिन्दूर, और चूड़ियाँ
बेशक मेरा सौंदर्य बढाती हैं
पर यह भी तो सच है
कि ये ही मेरी
सीमाएं भी बनाती हैं।
तो और कब तक मैं
सौंदर्य की देवी बनी रहूंगी?
कब तक पुजवाती रहूंगी खुद को?
और कब तक पूरी करती रहूंगी
तुम्हारी अतृप्त कामनाएं?
ये बिंदिया ही तो मुझे रोकती है
तुम्हारे अलावा कुछ और सोचने से
ये चूड़ियाँ ही बांधे रखती हैं
मेरे हाथों को
तब भी
जब तुम
सारी मर्यादायें तोड़ देते हो
और ये सिंदूर.....
ये सिन्दूर
मुझ पर
तुम्हारे अधिपत्य का प्रमाण है।
जीते जी तो तुम
अपनी चलाते ही हो
मरने के बाद भी
सफ़ेद वस्त्र
और सात्विक भोजन की
बेड़िया दे जाते हो।
तुम कहते हो
ये सभी वस्तुएं
नियंत्रित करती हैं
मेरी दुर्भावनाओं को
मेरे आचार को
मेरे व्यवहार को
तो क्या इस लोक में
ऐसी कोई भी वस्तु नहीं
जो नियंत्रित कर सके
तुम्हारी भी दुर्भावनाओं को
तुम्हारे आचार को
तुम्हारे व्यवहार को?
सुनो
ये सब व्यर्थ की बातें हैं
भोजन, वस्त्र और आभूषण से
आचार विचार नियंत्रित नहीं होते
यदि ऐसा होता
तो मुस्लिम स्त्रियां पतिव्रता नहीं होतीं
और ईसाईयों में भी समस्या होती
ये सब तो बस एक बहाना है
तुम्हारा मक़सद तो मात्र
हमें उपनिवेश बनाना है।
देवदासी
वो मेरे देवता हैं
हर रूप में
और मैं उनकी देवी हूँ
सशर्त
पहचान
बड़ी कोशिशें की
खुद को जानने की
पहचानने की
ज्ञानियों से चर्चा की
पोथियाँ पढ़ी
ध्यान लगाया
पर आज जब
बाजार गई
तो समझ आया
कि मैं
ब्लाउज और
पेटीकोट हूँ
इससे अधिक
कुछ नहीं
अच्छी स्त्रियां
कामेच्छा आपकी शारीरिक और मानसिक
सभी तापों को हरने का सामर्थ्य रखती है
पर अच्छी स्त्रियों में कामेच्छा नहीं होती
कंडोम आपको अनचाहे गर्भ और रोगों से
बचाने का सामर्थ्य रखता है
पर अच्छी स्त्रियां दुकानों पर
कंडोम खरीदने नहीं जातीं
गले लगने से बड़ा सुकून मिलता है
पर अच्छी स्त्रियां पिता, पुत्र, और पति के अलावा
किसी भी आत्मीय पुरुष मित्र से गले नहीं मिलतीं
मनचाहा जीवनसाथी स्वस्थ समाज का आधार है
पर अच्छी स्त्रियां समाज द्वारा थोपित पति को ही
मन से चाह लेती हैं।
पीड़ा को कह देने से उसका असर कम किया जा सकता है
पर अच्छी स्त्रियां माहवारी का दर्द चुपचाप सह लेती हैं
बेमेल विवाह का उपचार है तलाक़
पर अच्छी स्त्रियां तलाक़ नहीं देती
ज्ञान और ध्यान पर्याप्त हैं ब्रह्म मार्ग हेतु
पर अच्छी स्त्रियां अपने पति को ही ब्रह्म मान लेती हैं।
अब देखिये ना, हर धर्म में भगवान पुरुष ही हैं
ब्रह्मा विष्णु महेश ईसा अल्लाह इत्यादि
पर अच्छी स्त्रियां कभी कुतर्क नहीं करती हैं।
पिंजरा
अनिश्चित भविष्य से
बेहतर है
बेहतर है
निश्चित पीड़ा
इसीलिए
इसीलिए
पशु-पक्षी
पिंजरे में रहना पसंद करते हैं
और स्त्रियां विवाह में
पिंजरे में रहना पसंद करते हैं
और स्त्रियां विवाह में
स्वेच्छा
तुम स्वेच्छा से
भोग तो कर सकती हो
पर सम्भोग नहीं
कवच
दहेज़ की आग में जब रोज जलाई जाओगी
तो कौन आएगा तुम्हारे लिए
कमाऊ पति के रहते भी जब एक एक पैसे के लिए तरस जाओगी
तो कौन आएगा तुम्हारे लिए
तलाक़ मिलने पर जब रोड पर आ जाओगी
तो कौन आएगा तुम्हारे लिए
माँ-बाप की बदहाली में जब चाह कर भी हाथ नहीं बंटा पाओगी
तो कौन आएगा तुम्हारे लिए
तंगहाली में जब अनचाहे काम के लिए भी मज़बूर हो जाओगी
तो कौन आएगा तुम्हारे लिए
अब तो सोचो लड़कियों
ये जो पढ़ लिखकर तुम
आत्मनिर्भरता का कवच हासिल करती हो
विवाह की वेदी पर क्यों कुर्बान कर देती हो
क्या तुम जानती नहीं कि
कवच के बिना कर्ण का क्या हश्र हुआ था
शोषण, साज़िश और फिर हत्या का वो शिकार हुआ था
सब जानकर भी वही गलती दोहराती हो
खुद को तुम खुद ही लाचार बनाती हो
गर इसी तरह गलतियाँ दोहराओगी
अपनी ही हत्या पर आंसू बहाओगी
तो कौन आएगा तुम्हारे लिए
बोलो
मातृत्व
शादी की पहली रात
लड़की कहाँ कुछ बोल पाती है
कहाँ ली जाती है
उसकी रजामंदी
बस थोप दिया जाता है उसपर
मातृत्व
जाने अनजाने
परिवर्तन
समय बदल गया है
अब लड़कियां भी
मन की कर सकती हैं
जो चाहे खेल सकती हैं
जो चाहे पढ़ सकती हैं
जो चाहे पहन सकती हैं
बल्कि नौकरी तक कर सकती हैं
पर झाड़ू, पोछा, बर्तन और
रसोई के बाद।
विवाह
विवाह
समाज द्वारा प्रायोजित
बलात्कार है
क्योंकि इसमें भी
स्त्री के पास
'ना' का
कोई विकल्प
नहीं होता
अंतर्वस्त्र
अन्तर्वस्त्र इस्त्री नहीं किये जाते
अंतर्वस्त्र तह करके नहीं रखे जाते
अंतर्वस्त्र जल्दी जल्दी बदले भी नहीं जाते
अंतर्वस्त्र कहने को उपेक्षित रहते हैं
किन्तु अंतिम समय तक साथ रखे जाते है अंतर्वस्त्र
ये खुद कभी आगे नहीं आ पाते
पर व्यक्ति को आगे अवश्य कर देते हैं
ठीक आपकी जीवनसंगिनी की भांति
आपकी अर्धांगिनी की भांति
आपकी भामिनि की भांति।
प्रतिष्ठा
अहिल्या का उद्धार
और सीता का बहिष्कार
दोनों ही स्थिति में
प्रतिष्ठित राम ही हुए
मृगतृष्णा
हर पुरुष के भीतर
स्त्रीत्व होता है
और हर स्त्री के भीतर
पौरुष
फिर भी हम इन्हें
बाहर ढूंढते हैं
पञ्च तत्वों में
अमृत
रावण की
नाभि में
अमृत था
यदि यह भेद
राम को
ना पता चलता
तो वे संभवतः
रावण का वध
कभी नहीं कर पाते
रावण को
इतना समय भी ना मिला
कि वे उस अमृत को
स्थानांतरित कर पाते।
स्त्री का अमृत
उसकी योनि में है
यह भी अब भेद नहीं रहा
इसीलिए अब जो चाहे
उसे मार सकता है
बस एक बलात्कार
और स्त्री ख़त्म।
अगर वाकई
तुम जीना चाहती हो
अमर होना चाहती हो
तो इस अमृत को
अपने तन में नहीं
बल्कि मन में
स्थापित करो
क्योंकि वहां तक पहुंचना
देवताओं के लिए भी
संभव नहीं
पर्याय
तुम प्रकृति का पर्याय
कैसे हो सकती हो
तुम उसकी सदृश
सुन्दर तो हो
किन्तु उसकी तरह
सामर्थ्यवान नहीं।
लक्ष्य
वो बेटा था
बड़ी उलझनें थी
विकल्प जो इतने थे
जैसे डॉक्टर
इंजीनियर
साइंटिस्ट
इत्यादि
और वो बेटी थी
कोई उलझन नहीं थी
क्योंकि
कोई विकल्प ही नहीं था
बस लक्ष्य था
एकमात्र
अच्छा वर
बंद कमरे में
फुटपाथ की वह
मैली कुचैली
गन्दी सी लड़की
बंद कमरे में
खूबसरत हो जाती है
उसके बदन का मैल
स्वर्ण धूलि हो जाता है
उसके तन की दुर्गन्ध
मादक हो जाती है
और उसकी जाति…..
उसकी जाति तो
प्रवेश ही कर नहीं पाती
उस बंद कमरे में
अहिल्या
मैं शापित नहीं थी
स्वयं पत्थर हो गई थी
यह सोचकर
कि एक पुरुष ने मुझे तार तार किया
दूसरे ने बहिष्कार किया
और फिर तीसरे ने उद्धार किया
तो क्या मेरा अपना
कोई अस्तित्व नहीं....?
क्या अर्धनारीश्वर भ्रम मात्र है?
क्या शिवशक्ति एक साजिश मात्र है?
नहीं, संभवतः गलती मेरी ही है
जब मैं ही शक्ति नहीं
तो शिव की कल्पना ही व्यर्थ है
दरअसल बिना शक्ति के
शिव का कोई अस्तित्व ही नहीं
मुझे शक्ति बनना ही चाहिए था
शिवत्व को प्राप्त करने के लिए
अर्धनारीश्वर को जीवंत रखने के लिए
मुझे शक्ति अब बनना ही होगा
शिवत्व को प्राप्त करने के लिए
अर्धनारीश्वर को जीवंत रखने के लिए
निर्णय
सब कुछ तो ठीक था उस दिन
लव और कुश
दोनों सक्षम व समर्थ थे
राम भी तो उस दिन
उनके समक्ष थे
फिर किस बात ने
उनको विचलित कर दिया
स्वयं हत्या का निर्णय ले लिया
निर्णय तो हालाँकि उस दिन ही ले लिया था
राज्य से जब बहिष्कार हुआ था
तब माँ की ममता ने रोका था उनको
भला कैसे उजाड़ देती अपनी ही कोख को
विकट बड़ी थी उस दिन समस्या
पर उन्होंने चुना उस दिन तपस्या
खुद को तब पत्थर किया था
लव कुश को जीवन दिया था
किन्तु तपस्या जब पूर्ण हुई
जीने की इच्छा विदीर्ण हुई
करती भी क्या भला जीकर वो
किसकी राह आखिर तकती वो
अहिल्या सा भी न भाग्य था उनका
कोई भी तो नहीं था जो करता उद्धार उनका
स्वयं हत्या एकमात्र विकल्प था
हालांकि द्रोह भी कर सकती थी
नारी समुदाय के लिए लड़ सकती थी
इच्छा शक्ति व सामर्थ्य दोनों था उनमें
किन्तु उन्होंने सब व्यर्थ किया
गलत दिशा में निर्णय लिया।
कैकयी
कैसे होने देती मिथ्या उनका वचन
कैसे टूटने देती रघुकुल की रीति
उन्होंने ने ही तो वचन दिया था पिताश्री को
बनाएंगे राजा मेरे ज्येष्ठ पुत्र को
पर पुत्र मोह में वो पड़ गए थे
वचन अपना भूल गए थे
कलेजे पर पत्थर तब रखना पड़ा था
निर्णय था दुष्कर पर करना पड़ा था
कुल की प्रतिष्ठा सर्वोपरि थी
मुश्किल की वो घडी बड़ी थी
जानती थी कलंक मुझको लगेगा
सारा ज़माना अपशब्द कहेगा
पर मुझको यह बर्दाश्त था
कुल का आकाश अब साफ़ था
तुलसी के पात्र
वे अयोग्य हैं
क्योंकि वे असाधारण हैं
वे अयोग्य हैं
क्योंकि वे दिशाहीन हैं
शासक जानते हैं कि
जिस दिन उन्हें दिशा मिल जायेगी
वे उनपर हावी हो जायेंगे
इसलिए शासक
साम दाम दंड भेद से
उन्हें ताड़ित करते हैं
प्रताड़ित करते हैं
शासक जानते हैं कि
यदि उन्हें अधिकार दिए गए
तो वे स्वतंत्र नहीं
स्वछन्द हो जायेंगे
स्वछन्द अर्थात
स्वयं निर्धारित
बंधन में रहने वाले
अर्थात
सभी सामाजिक बंधनों से
परे रहने वाले
ये जो वे हैं ना
ये तुलसी के वही पात्र हैं
जो ताड़न के अधिकारी हैं।
मर्यादा पुरुषोत्तम
राम अगर
सीता का त्याग
नहीं करते
तो भी इससे उनकी
मर्यादा पुरुषोत्तम की प्रतिष्ठा पर
कोई आंच नहीं आती
और ना ही उनको
अपूज्य घोषित किया जाता
चाँद और इंद्र की भांति
उनके भी इस दोष की
उपेक्षा कर दी जाती
मैं मानता हूँ कि
उनके लिए निर्णय लेना
अत्यंत कठिन व पीड़ादायी था
मैं यह भी मानता हूँ कि
राजधर्म पतिधर्म से
ऊपर है
किन्तु संभवतः उन्होंने
मानव धर्म पर
विचार ही नहीं किया
यदि वे विचार करते
तो निश्चित रूप से
सीता का त्याग नहीं करते
क्योंकि
यह प्रश्न मात्र
सीता के भविष्य का नहीं था
यह प्रश्न सीता और अहिल्या जैसी
उन समस्त स्त्रियों के भविष्य का था
बल्कि संपूर्ण नारी समुदाय के भविष्य का था
बोटी
वो बीच सड़क पर
निःसंकोच, बेझिझक
आँखों से ही
पूरी बोटी निगल जाते हैं
पर जब दुकान पर जाते हैं
तो झटके और हलाल में उलझ जाते हैं
साज़िश
गाय और स्त्री की स्थिति अलग नहीं
दोनों पुरुषों की साज़िश के शिकार हैं
गाय का दूध सर्वश्रेष्ठ था
जबकि स्त्री मनुष्यों के अस्तित्व के लिए अनिवार्य थी
एक को गौमाता का सिंहासन देकर
यह विश्वास दिलाया गया
कि उसका जन्म मात्र दूध देने के लिए ही हुआ है
और दूसरी तरफ
स्त्री को महानता के शिखर पर बैठाकर
यह यकीन दिलाया गया कि
उसके जन्म की सार्थकता माँ बनने में ही है
एक को गौशाला में रखा गया
और दूसरे को घूँघट में
एक को खूंटे से बाँधा गया
और दूसरे को पुरुष से
दोनों तभी तक पूजे गए
जबतक उर्वर रहे
अर्थात मनुष्यों को सेवा देते रहे
माँ
उनकी हर बददुआ दुआ हो जाती है
मेरे आगे मेरी माँ जो आ जाती है
मैं जब भी पुकारता हूँ भगवान को
माँ कहीं भी हो दौड़ी चली आती है
देवता मन मसोस कर रह जाते हैं
माँ अपने हांथों से जब खिलाती है
मेरा एक एक आंसू मोती हो जाता है
माँ जब इन्हें आँचल में समेट लाती है
माँ कभी नहीं सोती
माँ कभी नहीं सोती
घर में सब जब
गहरी निद्रा में
डूब जाते हैं
वह तब भी
जागती रहती है
बुनती रहती है
सब के लिए
रंग बिरंगे ख्वाब।
याद करो
जब तुम
शिशु थे
तब गहरी निद्रा में भी
तुम अक्सर
मुसकुराते रहते थे
उसी दिन से वह
बुन रही है ख्वाब
ढेर सारे ख्वाब
ताकि
जब वो ना रहे
तब भी
तुम यूँ ही मुसकुराते रहो
ज़िन्दगी भर
अजनबी
वो जब खुश होते हैं
हम उनसे बात नहीं करते
वो जब दुखी होते हैं
हम उनसे बात नहीं करते
वो जब भूख मिटाने की प्रक्रिया में होते हैं
हम तब भी उनसे बात नहीं करते
क्योंकि
किसी अजनबी से बात करना हमें पसंद ही नहीं
आ जाओ प्रिय
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
दिन-दिन ये प्यास बढ़ी जाये
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
धड़कन बिन साज़ तड़पते है
नैना अविराम छलकते है
ये अधर न कुछ कह पायें प्रिय
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
आंसू जो रात बरसते है
शबनम उन्हें लोग ये कहते है
मेरा दर्द समझ ना ये पायें प्रिय
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
कोई रात सुहागिन हो ना सकी
हर सांझ यहाँ पर तनहा है
चुपके से बस आ जाओ प्रिय
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
ये बदलियाँ फिर-फिर आती हैं
आकर मुझको भरमाती हैं
डर है कि बहक ना मैं जाऊ प्रिय
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
चकवा बन तुमसे क्यों नेह किया
बाती बन पल-पल क्यों मैं जला
भौरा ना कही बन जाऊ प्रिय
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
तुम भी चुपचुप सब सहती हो
दुनिया से कुछ ना कहती हो
अब तो दिल की कर जाओ प्रिय
आ जाओ प्रिय, आ जाओ प्रिय
तेरे एक आंसू पर
तेरे एक आंसू पर
मैं सूर्य सा जल जाता हूँ
बर्फ सा पिघल जाता हूँ
आसमां सा उलट जाता हूँ
धरती सा फट जाता हूँ
तेरे एक आंसू पर......
सृष्टि
एक अक्षर तुम
निरर्थक
एक अक्षर मैं
निरर्थक
तो अक्षर अक्षर को
आओ शब्द करते हैं
जीवन को
सार्थक करते हैं
वाक्य समाज को
हम पूर्ण करेंगे
सृष्टि में
काव्यत्व भरेंगे
खयाल
तेरे आने के खयाल से ही
मेरे शब्द मचल जाते हैं
कितना समझाता हूँ
फिर भी झगड़ जाते हैं
कुछ मीर, कुछ जायसी
कुछ बिहारी हो जाते हैं
जो रह गए वो बेचारे
ज़फर कहलाते हैं
पॉपकॉर्न
ज़माने की आग पर
जब जब
प्यार की कढ़ाही
चढ़ती है
तुम शांत रेत सी
तप जाती हो
और मैं
पॉपकॉर्न सा
फूट पड़ता हूँ।
प्रेम
मैं
उन दिनों
बस तुम्हें ही
लिखता था
क्योंकि
हर किसी में
तुम ही
नज़र आती थी
किन्तु
अब मैं
सबको लिखता हूँ
क्योंकि
तुममे मुझे
अब
सब नज़र आते हैं।तुम
सुबह की चाय की पहली चुस्की हो तुम
गंगा स्नान की पहली डुबकी हो तुम
ओस की रिमझिम वृष्टि हो तुम
मुझे बार बार जगाने वाली अंतर्दृष्टि हो तुम
बेंगॉल की रस्गुल्लम मिष्टी हो तुम
सच कहूँ तो मेरी पूरी सृष्टि हो तुम
पागलपन
मैं दिन के तेज उजाले में
जब तुम्हें लगभग भूलने को होता हूँ
शाम गुनगुनाने लगती है
चाँद मुस्कुराने लगता है
सितारे महफ़िल सजा देते हैं
और तब मेरा दर्द
बहरूपिया बन
कभी गीत, कभी ग़ज़ल
और कभी शायरी बन
पूरी रात नाचता रहता है
पागलों की तरह
कठपुतली
नेह की डोर से बंधी हुई हूँ
अनजान नगर की बदली हूँ
गठरी हूँ संवादों की
अभिलाषा की मैं पटरी हूँ
औ तम के प्रकाश में खेल रही
एक सिद्धस्त कठपुतली हूँ
हाँ, बस एक कठपुतली हूँ!
कैक्टस
ना गुलाब, ना सूर्यमुखी,
ना ही रात की रानी बन पाऊंगा
लाख जतन कर ले तू माली,
केक्टस हूँ केक्टस ही रहूँगा
अपने नेत्र-लाभ की खातिर
कांट-छांट ना यूँ मुझको
छिपकर तेरी अभिलाषा में
निज से भला कब तक मैं बचूंगा
हाँ काँटों का भंडार हूँ मैं,
पर मरू का तो श्रृंगार हूँ मैं
तू ही कह मुझको ऐ माली,
सुगंध भला मैं कैसे जनूंगा
मर्दानगी
गाल, होंठ और आदि-आदि पर
होती है मुद्रित
जब दिन भर की कुंठाएँ
तब कही प्रकाशित होती है
मर्दानगी
गधा
सड़क पर खड़ा एक गधा
बोझ तले चूर-चूर
जब करने लगा ढेंचू-ढेंचू
तो मार ठहाका मिश्र हम भी
आये करते ढेंचू-ढेंचू
वियाग्रा
वियाग्रा
कर्मकांडी
भावशून्य
केवल उत्तेजना बढाने वाला
बिलकुल आजकल के
धर्मों की तरह
रिश्ते
रहने को तो मनुष्य
अकेला भी रह सकता था
किन्तु वह सक्षम नहीं था
अपनी सभी जरूरतों को
पूर्ण करने में
उसकी उन्हीं जरूरतों ने
जन्म दिया रिश्तों को
इन रिश्तों में प्राण भरे
दायित्वों ने
जिम्मेवारियों ने
और इसका
सौंदर्यीकरण किया
सुन्दर एवं सुकोमल
भावनाओं ने
यहाँ तक सब बेहतर था
किन्तु तब जाने कहाँ से
पनपने लगे थे अधिकार
जिसने सारा संसार
तबाह कर दिया
अब मनुष्य पुनः
अकेला है
विवश है जीने को
अपनी आधी-अधूरी
जरूरतों के साथ
प्रतिष्ठित
वे प्रतिष्ठित हैं
सबके आदर्श हैं
उनकी छवि
साफ़ सुथरी है
जानते हैं क्यों
क्योंकि
जब भी कोई चीखता है
वे कान बंद कर लेते हैं
जब किसी की इज़्ज़त लुटती है
तो वे ऑंखें बंद कर लेते हैं
और जब उन्हें कोई
इन सबके लिए
गरियाता है
तो वे मुंह को सिल लेते हैं
ताकि उनके मुंह से
कोई ऐसी प्रतिक्रिया
ना निकल जाये
जिससे वे
पक्ष और विपक्ष में
बँट जाएँ
इस तरह
वे दुनियाभर के अवगुणों की
सरलतापूर्वक
उपेक्षा कर पाते हैं
और रख पाते हैं स्वयं को
बेदाग
साफ़ सुथरा
प्रतिष्ठित
महाभारत
जब मैं
पुत्र के सामने होता हूं
तब सिर्फ
पिता रहता हूं
जब मैं
माँ के सामने होता हूँ
तब सिर्फ
पुत्र रहता हूँ
जब मैं
पत्नी के समक्ष होता हूँ
तब सिर्फ
पति रहता हूँ
और जब मैं
मित्र के साथ होता हूं
तब केवल
मित्र रहता हूँ
एक समय में मैं
केवल एक ही चरित्र को
जाग्रत रखता हूँ
बाकि सबको
सुप्तासन् दे देता हूँ
क्योंकि मैं जानता हूँ कि
जिस दिन
एक समय में
एक से अधिक चरित्र
जाग्रत हो जायेंगे
महाभारत निश्चित है
मैं यह भी जानता हूँ कि
इस महाभारत में
कृष्ण भी मैं ही रहूँगा
और अर्जुन भी मैं ही
कौरव भी मैं ही रहूँगा
और पांडव भी
इस महाभारत में
मारने वाला भी
मैं ही रहूँगा
और मरने वाला भी
कुल मिलाकर
इस महाभारत में
जीत बेशक किसी की भी हो
किन्तु मौत
मानवीयता की ही होगी।
ज़िद
बच्चा है वो
जो भी पसंद आता है
ज़िद ठान लेता है
रोता है
चीखता है
चिल्लाता है
अनवरत
उसे इसकी
बिलकुल भी परवाह नहीं
कि इससे उसकी
जान भी जा सकती है
या फिर लोग
क्या सोचेंगे
उसके इस बचपने पर
अर्जुन की भांति
बस टूट पड़ता है
और पाकर ही रहता है
मनचाहा लक्ष्य
जानते हो क्यों
क्योंकि
उसके बचपने की ज़मीं पर
विकल्पों के खरपतवार
पनप ही नहीं पाते।
किताब
मैं किताबों से बेहतर
चेहरे पढ़ना पसंद करता हूँ
जिस पर समय के
हास-परिहास चिन्हित हैं
मैं किताबों से बेहतर
हाथ पढ़ना पसंद करता हूँ
जिस पर ज़िन्दगी और मौत के
तांडव के चित्र उत्कीर्णित हैं
मैं किताबों से बेहतर
पीठ पढ़ना पसंद करता हूँ
जिसमें परिवार, समाज, और राष्ट्र के
सिंहासन दफ़न है
मैं किताब से बेहतर
ह्रदय स्थल पढ़ना पसंद करता हूँ
जिसमें छिपा रखा है उसने
स्वयं को
मैं किताबों से बेहतर
सृजन स्थल को पढ़ना पसंद करता हूँ
जिसमें सृजन व विनाश के
अवशेष रखे हैं
मैं किताबों से बेहतर
पांव पढ़ना चाहूंगा
जिसमें मिल जाएगी दास्ताँ
रास्तों को रौंदने और गढ़ने की
मैं किताबों से बेहतर
लोगों को पढ़ना चाहूंगा
क्योंकि किताब महज एक दृष्टिकोण है
और ये लोग बहुआयामी
शहर में
आना है तो आ जाओ शहर में
पर याद रखना ये बातें शहर में
आसमां का रुख ना करना कभी
लोग ज़मीं भी चुरा लेते हैं शहर में
बिटिया को सिखा देना सब कुछ
दुस्सासन बहुत हैं, कृष्ण एक नहीं शहर में
आंसुओं को छिपा कर रखना सदा
लोग पानी भी बेच देते हैं शहर में
देखो ख्वाबों को किसी से ना कहना तुम
लोग खूब मज़ा लेते है शहर में
और रावणों का संग ही करना बस
राम को ज़िंदा जला देते हैं शहर में
हे विश्व्गुरु!
धर्म क्या है?
जीने की कला ही ना
कर्म का अनुशासन ही ना
सुव्यवस्थित जीवन का
सूत्र ही ना
इन पञ्च तत्वों की क्षमता का
सम्पूर्ण उपयोग ही न
शक्ति और सौंदर्य के मिलन का
संयोग ही ना
तो हे विश्व्गुरु!
तुम क्यों इस तरह
बिखरे हो?
क्यों हर क्षेत्र में
पिछड़े हो?
क्यों हर किसी के आगे
हाथ पसारते हो?
क्यों अपने अस्तित्व के लिए
गिड़गिड़ाते हो?
बताओ ना
हे विश्व्गुरु!
लेखक
आसक्ति और विरक्ति
राग और विराग
यही एक लेखक की
नियति है
और साथ ही दायित्व भी
नियति इसलिए
क्योंकि
उसका ना हृदय पर
नियंत्रण होता है
और ना ही मस्तिष्क पर
और
दायित्व इसलिये
क्योंकि बंधन
उसके निष्पक्ष होने में
सबसे बड़ी बाधा है।
उलझन
यहाँ ना खेलूं
वहाँ ना खेलूं
तो बताओ ना मम्मा
कहाँ मैं खेलूं
ना गोलू के साथ
ना भोलू के साथ
खेलूं भला फिर
किसके साथ
ठंड में ठण्डी लग जायेगी
गर्मी में लू खा जायेगी
बारिश कर देगी बीमार
हे भगवान!
अब तुम ही करो उपचार
रचना और रचनाकार
गर
लोगो के ज़ेहन में
आपकी रचनाएं हैं
तो समझिए
आपकी लेखनी
सार्थक है
किन्तु
यदि लोगों के ज़ेहन में
आप हैं
तो समझिए
आपकी
कलम की स्याही
सूख रही है
आखिर क्यों?
आखिर क्यों
नक्सलियों व आतंकियों की गोली से
आम आदमी ही मरता है?
क्यों नहीं इनकी गोली से
कोई खास आदमी मरता है?
क्यों सत्ता इनको निपटाती नहीं है
क्या यह उनके बस की नहीं है
क्या उनके पास ताक़त की कमी है?
या फिर उनके पास संसाधनों की कमी है?
गर हाँ
तो फिर कैसे करगिल से दुश्मन भगाया?
कैसे पंजाब को आतंकमुक्त बनाया?
कैसे वीरप्पन के घुटने टेकवाये?
कैसे बड़े बड़े आंदोलन कुचलवाये?
शायद सत्ता यह चाहती ही नहीं है
उनके पास कोई कमी नहीं है
कमी है तो बस इच्छा शक्ति की
कमी है तो बस आम आदमी को
आदमी ना समझने की
या फिर कोई और ही बात है
कहीं ऐसा तो नहीं कि
सांठ-गांठ है
तरक्की
सब कहते हैं देश तरक्की कर रहा है
दुनिया में अपनी पहचान बना रहा है
और अब तो सुपरपावर बनने की ओर अग्रसर है
पर किशन तो आज भी पूरा दिन
खेतों में पसीना बहाकर
बस घास फूस की झोंपड़ी ही बना पाया है
रामदीन आज भी रिक्शा चला कर
बड़ी मुश्किल से अपना घर चला पाता है
और रोहित कंपनी में काम करके भी
घरवालों की मनोकामनाएं पूरी करने में
असमर्थता जताता है
ऐसा भी नहीं है
कि इनकी ज़िन्दगी बिलकुल भी नहीं बदली
तीनों की आमदनी जरूर बढ़ी है
पर उससे चौगुनी रफ़्तार से बढ़ी है
उनके द्वारा उपभोग की गई वस्तुओं की कीमत
और इन दोनों को संतुलित करने के प्रयास में
बढ़ा है ऋण
और इन ऋणों को ना चुका पाने की स्थिति में
बढ़ी हैं चोरी, डाके, हत्याएं, आत्महत्याएं
अर्पण
उसे पूजा पाठ
आसान लगा
क्योंकि उसमें
फूल पत्तों इत्यादि को
अर्पित करना था
जबकि अच्छे कर्म
अपेक्षाकृत मुश्किल थे
क्योंकि उसमें
स्वयं को अर्पित करना था
अगर….
स्त्री अगर स्त्री का सम्मान करे
तो पुरुष की क्या मज़ाल
जो उसका अपमान करे
वो आतंकी है
गोला बारूद से नहीं मरेगा
चलो मंदिरों औ मस्जिदों को ख़ाक करें
यूँ मौन रहोगे
तो गलतफहमियां तो बढ़ेंगी ही
आओ बैठकर बात करें
खुदा, गॉड, ईश्वर
हमारे डर की ही तो पैदाइश है
इनकी क्या जरुरत
गर हम आपस में प्यार करें
धर्म
वेशभूषा
खान पान
भाषा
ये सब
अभिव्यक्ति के
माध्यम मात्र हैं
धर्म से
इनका कोई लेना देना नहीं
क्योंकि धर्म की विषय वस्तु
आचरण है
और आचरण का आधार
विज्ञान।
झटका
कौन कहता है
मुस्लिम धर्म में
झटका निषेध है
जो ये कहते हैं
मानते हैं
वे मुर्ख हैं
यकीं नहीं
तो सुनो
मुस्लिम महिला
झटका और हलाल
दोनों होती हैं
पहले ट्रिपल तलाक़ से झटका
फिर हलाला से हलाल।
हलाला
हलाला
मुस्लिम महिलाओं को
हलाल करने का
धार्मिक यंत्र है
इस पर प्रश्नचिन्ह
मुस्लिम धर्म के ठेकेदारों के लिए
झटका है
और झटका
मुस्लिम धर्म में
निषेध है
क्या हो जाता.....
क्या हो जाता जो आप
स्मार्ट सिटी पे पैसा ना बहाते
कई स्कूलों में शिक्षकों के
रिक्त पद भर जाते
रिक्त पद भर जाते तो
विद्यार्थी शिक्षित हो जाते
गांव गांव और शहर शहर
खुदबख़ुद स्मार्ट हो जाते
क्या हो जाता जो आप
दूसरे देशों को पैसा ना बांटते
अपने यहाँ के कई गरीबों
के हालात सुधर जाते
कई गरीबों के हालात
जो यहाँ सुधर जाते
तो माननीय आप उनसे
और पैसा कमाते
क्या हो जाता जो आप अपनी
सुविधाएँ कम कर लेते
सीमा पर डटे जवानों को
बुलेटप्रूफ जैकेट मिल जाते
ये बुलेटप्रूफ जैकेट उनको
गर माननीय मिल जाते
तो संभवतः उनमें से
कुछ जवान बच जाते
देश और भगवान
जिस देश में भगवान सर्वशक्तिमान होते हैं
उस देश के लोग बड़े ही कमज़ोर होते हैं
और जिस देश के लोग बड़े कमज़ोर होते हैं
वो देश भला अपने पैरों पर कैसे खड़ा हो सकता है
जिस देश में भगवान के बहुत सारे घर होते हैं
उसी देश के बच्चे फुटपाथों पर पल रहे होते हैं
और जिस देश के बच्चे फुटपाथों पर पल रहे होते हैं
वो देश भला नेतृत्व कैसे कर सकता है
जिस देश में भगवान का डर होता है
उसी देश में कुप्रथाओं का घर होता हैं
और जिस देश में कुप्रथाओं का घर होता हैं
वो देश भला स्वस्थ कैसे रह सकता है
जिस देश में भगवान छप्पन भोग खाते हैं
उसी देश में किसान आत्महत्या कर रहे होते हैं
और जिस देश में किसान आत्महत्या रहे होते हैं
वो देश भला ईमानदार कैसे हो सकता है।
भगवान्
वे सक्षम थे
समर्थ थे
चौदह और सोलह कलाओं से
परिपूर्ण भी थे
फिर भी
वे मात्र
रावण और कंस जैसे
दुष्टों को ही मार कर सके
किन्तु दुष्टता का
बाल भी बांका न कर सके।
कुरीतियां, कुप्रथाएं
तांडव करते रहे
मानवीयता की छाती पर
उनके समक्ष भी
फिर भी वे कुछ न कर पाएं।
ऐसा भी नहीं
कि उनका ध्यान ही नहीं गया इन पर
वे तो अन्तर्यामी भी थे
और देखो फिर भी भगवान हो गए
मात्र चंद दुष्टों को मारकर।
भगवान तो तब
ईश्वरचंद विद्यासागर जैसे वीरों को भी होना चाहिए
जिन्होंने दुष्ट नहीं दुष्टता का संहार किया
पूरे समाज से लोहा लिया
वो भी अपनी या कुल की प्रतिष्ठा के लिए नहीं
बल्कि अपने समाज की प्रतिष्ठा के लिए
संस्कृति की प्रतिष्ठा के लिए
मानवीयता की प्रतिष्ठा के लिए
और देखिये न
वे चौदह या सोलह कला से भी
परिपूर्ण नहीं थे।
किन्तु ऐसा हो न सका
जानते हो क्यों
क्योंकि उनपर
वाल्मीकि और तुलसी जैसे
भक्त महाकवियों की
दृष्टि ही नहीं पड़ी
एक सैनिक की मौत
सैनिक कभी नहीं मरता
वह शहीद होता है
ऐसा मैंने भी सुना था
किन्तु आज मैंने
एक सैनिक को
मरते देखा है
वह सीमा पर नहीं मरा
वह दुश्मन की गोली से भी नहीं मरा
वह तो तब मरा
जब चंद दो कौड़ी के नेताओं ने
उसकी शहादत पर घटिया राजनीति की
वह तब मरा
जब देशवासियों ने
उसके जिगर के टुकड़े के भविष्य को
रौशन करने की बजाय
चार मोमबत्तियां जलाकर ही
अपनी श्रद्धांजलि को निपटा लिया
वह तब भी मरा
जब इस देश ने
उसकी प्राणप्रिय को
प्रतिष्ठित ज़िन्दगी देने के बजाय
शहीद के पार्थिव शरीर को सलूट कर
अपने कर्तव्य की पूर्ति की
वह तब भी मरा
जब इस देश ने
उसकी माँ के आंसू पोंछने की बजाय
चंद आंसुओं और आक्रोश में ही
अपनी देशभक्ति को बहा दिया
सैनिक का मरना अच्छा नहीं होता
जिस देश में सैनिक मरते हैं
वो देश मृतप्राय ही होता है
भक्त
भक्त बनना
इतना आसान नहीं
इसके लिए
अपने नाक और कान
दोनों कटवाने पड़ते है
ताकि आपकी
श्रवण करने
और परखने की शक्ति
दोनों ही क्षीण हो जाये
धर्म और राजनीती
दोनों की ही फैक्ट्री में
यह उत्पाद
भारी मात्रा में निर्मित किये जाते हैं
आहुति
भक्ति
दर्शन की विषय वस्तु है
प्रदर्शन की नहीं
फिर चाहे वह
देशभक्ति हो
या ईश्वर भक्ति
किन्तु यदि
यह प्रदर्शित की जाने लगे
तो आपको आशंकित होना चाहिए
क्योंकि यही वह पृष्ठभूमि है
जिसका दुरुपयोग कर
तथाकथित भक्त ठेकेदार
आप पर हावी होने का प्रयास करने लगते हैं
और फिर इसी पवित्र यज्ञ में
आपकी ही आहुति देकर
आतंक और भ्रष्टाचार की अग्नि को
हवा देते हैं।
जंगल में नोटबंदी
शेर चुनाव जब जीत कर आया
सब पर अपना रौब जमाया
सूट बूट नए सिलवाए
मेहमान बड़े बड़े बुलवाये
दुनिया भर की फिर सैर कर आया
देश का माल सब चट कर आया
पैसा बचा था अब बहुत ही कम
सियारों को उसने दिखलाया दम
सियारों ने तब व्यथा सुनाई
व्यापर घाटे की कथा सुनाई
बोले पूंजी हमको दिलवाओ
बैंकों से क़र्ज़ पास करवाओ
शेर ने तब गीदड़ों को बुलवाया
क़र्ज़ देने का फरमान सुनाया
गीदड़ भी सारे रोने लगे
सियारों के क़िस्से कहने लगे
बोले माल्या जैसे बहुत सियार थे
जिनपर कर्ज़े बेशुमार थे
आपने उनको भगवाया
हमारी पूंजी को डुबवाया
आपको तो मिल गया कमीशन
पर हमको हो गई टेंशन
बैंक हमारे खाली है
छाई पूरी कंगाली है
शेर महाराज अब सोच में पड़ गए
अय्याशी पर ताले पड़ गए
उन्होंने तब पृष्ठभूमि खुजलाई
कुटिल मुस्कान चेहरे पर आई
बोले नोटबन्दी करते हैं
पब्लिक का पैसा बैंक में भरते हैं
गीदड़ तुम उससे बहुत कमाना
और सियारों को भी क़र्ज़ खिलाना
तभी गीदड़ ने पूंछ उठाई
बोला सुनो शेर मेरे भाई
तय है इससे नोटों का आना
पर कौन रोकेगा इसका जाना
90 प्रतिशत यहाँ कैश है चलता
निचले तबके का पेट है पलता
पैसा वो दो दिन ही रखेंगे
हमें फिर कंगला बना छोड़ेंगे
तुम्हे क्या लगता है ये खेल है
तुम्हारी ये योजना फेल है
शेर ने फिर थोड़ा पूंछ हिलाया
कैशलेश उपचार बताया
कहा इससे तुम सबकी जेब भरेगी
हालाँकि कुछ पब्लिक भी मरेगी
पर उसका भी इंतजाम करेंगे
देशभक्ति का रंग भरेंगे
और गर किसी ने किया रंग में भंग
उसको मिलेगा देशद्रोह का दंड।
यह सुनकर सब उछलने लगे
सियार गीदड़ गले मिलने लगे
शेर भी खुद को अब रोक न पाया
अपने असली रूप में आया
माइक उठाकर उसने गाया
हुवा हुवा कर नवगीत सुनाया
चमत्कार
ये भगवानों का देश है
यहाँ सिर्फ चमत्कार होता है
पसीना कितना भी बहा लो
उसकी मर्ज़ी के बिना सब बेकार होता है
अब देखो न
किसान कितना भी अन्न उगा ले
गरीबी ही झेलता है
पर उसी अन्न को घर घर बेचने वाला
रुपयों में खेलता है
मज़दूर कितना भी पसीना बहा ले
मज़बूर ही रहता है
पर उसी के पसीने की खाने वाला
अमीरी में चूर रहता है
सैनिक जान भी गवां दे
तो चार मोमबत्तियों में ही निपट जाता है
और एक खिलाड़ी निचला मैडल भी ले आये
तो करोड़ों बरस जाता है
आखिर कौन है ये भगवान
और कैसे करता है वो ये चमत्कार
किस आधार पर तय करता है
किसी के काम की कीमत
क्या आपको नही लगता
इस पर पुनर्विचार होना चाहिए
हर व्यक्ति को सुख का
अधिकार होना चाहिए
हालाँकि यह इतना आसान नहीं है
पर दुनिया में कोई मुश्किल काम भी नहीं है
पैमाना
विकास का पैमाना यह नहीं
कि आपके देश में इमारतों की ऊंचाई कितनी है
विकास का पैमाना यह है
कि आपके देश में कच्चे घरों की पैदाइश कितनी है
ज्ञान का पैमाना यह नही
कि आपकी किसी विषय में गहराई कितनी है
ज्ञान का पैमाना यह है
कि आपके आचार और विचार के बीच खाई कितनी है
समझदारी का पैमाना यह नही
कि आप कितनों को कितना समझा पाते हैं
समझदारी का पैमाना यह है
कि आप कितनों को कितना समझ पाते हैं
महानता का पैमाना यह नही
कि आपने कितने कीर्तिमानों को तोड़ा है
महानता का पैमाना यह है
कि आपने बुरे वक़्त में खुद को कैसे जोड़ा है
मुझे अपनी ऊँगली थमा दो न
उन दिनों जब मैं छोटा था
घुटनों के बल ही चलता था
तुम बार बार अपनी ऊँगली थमा
मुझे पैरों पर चलाते थे
मेरा हौसला बढ़ाते थे
और जब जब मैं गिर पड़ता था
मिटटी से लथपथ रहता था
तुम कोई प्रश्न नही करते थे
अविलंब मुझको गोदी में उठा
मेरे सब दुःख हर लेते थे
मुझे सीने में भर लेते थे
तब प्रतिष्ठा की न चिंता थी तुम्हें
न अस्तित्व की दीवार लाते थे
आज मैं फिर घुटनों पर हूँ
मुझे अपनी ऊँगली थमा दो न
मुझे फिर से चलना सिखा दो न
एक था सैनिक
परियों के किस्से उन्हें भाते नहीं थे
वीरों के प्रसंग लुभाते थे
वीर सिंह था नाम उनका
उनके साथी बतलाते थे
कड़क सर्दी में जहाँ अन्य
कम्बल में घुसे रह जाते थे
उस बर्फीले मौसम में भी
वीर सिंह पसीना बहाते थे
राष्ट्र सेवा का जुनून था उनमें
राष्ट्रहित में ही मिटना चाहते थे
हर हद से गुजरना आता था उन्हें
सैनिक वो बनना चाहते थे
फिर एक दिन वो भी आया
जब ख्वाब हक़ीक़त बन पाया
सैनिक की वर्दी उन्हें हासिल हुई
ख़ुशी से वो फूला ना समाया
छावनी में जब वो जा पहुंचे
भोजन का बुलावा तब आया
दंग रह गए वो देखकर
भोजन में जब फर्क पाया
अफसरों का भोजन था अलग
और सैनिकों का भी था बिलकुल अलग
वजह इसकी वो समझ न पाएं
रुक से गये थे उसके पग
जाति, धर्म की ही भांति
दिवार यहाँ भी पाई थी
दिमाग उनका था सुन्न हो गया
जैसे किसी ने जूतियां बरसाई थी
यही शरीर तो उनका भी है
वही भूख है हमारी भी
फिर अंतर का क्या है मतलब
करते है एक सी जब मेहनत भी
जैसे तैसे सम्हाला खुद को
ड्यूटी में फिर वो लग गये
मेहनती तो थे पहले से ही
अफसर की नजर में वो चढ़ गये
शीघ्र अफसर की कृपादृष्टि हुई
घर में उनकी ड्यूटी लगी
राष्ट्रहित और देशभक्ति सब
बीवी, बच्चे और कुत्ते में गई
दुश्मन की गोली से भिड़ने की
जिन्होंने मित्रों ठानी थी
साहब बीवी के तानों से
आज घायल उनकी जवानी थी
पर वो पीछे कहाँ हटने वाले थे
अपना प्रण उन्होंने याद किया
अपने बंदूक की सारी गोलियां
साहब की छाती में दाग दिया।
समय का रहस्य
गिरने का मतलब यह नहीं
कि उसे चलना नहीं आता
हारने का मतलब यह नहीं
कि उसे खेलना नहीं आता
दिनकर भी तो साँझ होते होते
पस्त हो जाता है
हिमालय भी तो मौसम की मार से
त्रस्त हो जाता है
और चाँद तो पूरी ज़िंदगी अंधेरे में ही
काट लेता है
पर किस्सा यहीं खत्म नहीं होता
तीनों में से कोई हतोत्साहित नही होता
समय बदलता है
सूर्य फिर उदित होता है
चाँद अँधेरे में भी मुदित होता है
हिमालय फिर सीना तान लेता है
समय के रहस्य को जब ये जान लेता है
समय यह रहस्य हर किसी को समझाता है
इसीलिए वह सबको उठाता है गिराता है
नक्सली
बेवक़ूफ़ थे वे
उन्हें पता ही नहीं था कि
ज़मीन छिन जाने के बाद
उनके पास विकल्प था
कानूनी लड़ाई लड़ने का
तो क्या हुआ जो उस लड़ाई में
उनकी ज़िन्दगी गुजर जाती
उनकी कई पीढियां भीख मांगकर खाती
और घर की स्त्रियां मंटो की उल्टी सलवार को
फिर से जीवंत कर जाती
उन्हें पता ही नहीं था कि
ज़मीन छिन जाने के बाद
उनके पास विकल्प था
कानूनी लड़ाई लड़ने का
तो क्या हुआ जो उस लड़ाई में
उनकी ज़िन्दगी गुजर जाती
उनकी कई पीढियां भीख मांगकर खाती
और घर की स्त्रियां मंटो की उल्टी सलवार को
फिर से जीवंत कर जाती
तुम ज़िंदा तो हो, पर जाग्रत नहीं!!!
रिक्शे और रेहड़ी वालों से गर तुम
चंद रुपयों के लिए झगड़ जाते हो
पर रेस्तरां में जाकर टिप्स बरसाते हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
बीवी बच्चों की खातिर गर तुम
पर रेस्तरां में जाकर टिप्स बरसाते हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
बीवी बच्चों की खातिर गर तुम
ब्रांडेड सामान लाते हो
पर माँ-बाप की जरूरतों पर
पर माँ-बाप की जरूरतों पर
बजट का रोना रो जाते हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
नौकरी की दुहाई देकर तुम
दुर्घटना पीड़ित की उपेक्षा कर जाते हो
पर प्रेमी/प्रेमिका के मिलते ही
ऑफिस से छुट्टी कर जाते हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
रेप पीड़िता को देखकर तुम
रेप पीड़िता को देखकर तुम
आक्रोश दिखाते हो
पर उसी का एमएमएस
पर उसी का एमएमएस
चटकारे लेकर देख जाते हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
धर्मग्रंथों का विश्लेषण किए बिना तुम
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
धर्मग्रंथों का विश्लेषण किए बिना तुम
अक्षरशः रट जाते हो
और दूषित गंगाजल को भी
और दूषित गंगाजल को भी
आँख बंदकर पी जाते हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
बचपन से जवानी तक तुम
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
बचपन से जवानी तक तुम
अपना अंग-प्रत्यंग छुपाती हो
पर धर्म के नाम पर
पर धर्म के नाम पर
परपुरुष के साथ सो जाती हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
रचनाओं को पढ़कर गर तुम
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नहीं।।
रचनाओं को पढ़कर गर तुम
क्षणभर के लिए जाग जाते हो
पर उसके बाद फिर
पर उसके बाद फिर
कुम्भकर्ण से सो जाते हो
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नही।।
तो तुम ज़िंदा तो हो पर जाग्रत नही।।
वर्जित
धार्मिक स्थलों पर
उनका प्रवेश वर्जित है
क्योंकि वे
मासिक धर्म के चक्र में हैं
पर क्या पूजा पाठ से पहले
किसी ने यह जानना चाहा
कि मंदिर में स्थापित पूज्या के
मासिक धर्म का चक्र क्या है
ताकि उन्हें भी आप कर सकें
वर्जित
उस चक्र के दौरान
ये देश के नौजवान हैं!!!
ये देश के नौजवान हैं
सीट के लिए परेशान है
बस मेट्रो में ऐसे टूट पड़ते
जैसे कुत्ते भोजन पर झपटते
महिला औ बुजुर्गों से घबराते
देख उन्हें झट आँख मूंद जाते
घुटने जैसे इनके बेजान है
ये देश के नौजवान है
लम्बी लाइनों में लगने से डरते
शॉर्टकट में हर काम हैं करते
अच्छे बुरे का फर्क नहीं करते
समय अपना ये व्यर्थ नहीं करते
कॉलर साफ रखते हैं जनाब
दीवारों को पर करते खराब
जैसे इसमें इनकी शान हैं
ये देश के नौजवान हैं
घर का कोई काम न करते
दोस्तों पर है जान छिड़कते
जीएफ बीएफ के दर्द महसूसते
दुर्घटना पीड़ित पर इन्हें न दिखते
अपनी बहन पर नज़र है रखते
शक की नज़र से सभी को तकते
दूसरों की बहन को करते परेशान हैं
ये देश के नौजवान हैं।
बेशर्म
बड़ा बेशर्म है वो ईश्वर
जो उसने हमारे अंग-प्रत्यंग को गढ़ा
पृथ्वी पर भेजने से पहले
उसे एक बार तो सोचना था
कि हमारे किन-किन अंगों को ढकना था
बड़ा बेवक़ूफ़ है वो ईश्वर
उसे इतनी तमीज तो रखनी थी
हमारे पैदाइश की कोई और विधि रखनी थी
उसे स्त्री-पुरुष में कुछ तो फर्क रखना था
दोनों को स्त्री की ही कोख से नहीं जनना था
सच में, बड़ा अजीब है ये ईश्वर
जंगल में दलदल
छोटी गिलहरी बड़ी परेशान थी
दलदल के अर्थ से अनजान थी
माँ ने भी सब जतन कर लिया
उसमें से एक भी सफल न हुआ
तभी माँ को राम बाण सूझ गया
छोटी का उसने हाथ पकड़ लिया
बोली दलदल उसको कहते हैं
जब भी कोई दो दल मिलते हैं
जैसे तीर पर कमल का खिलना
जैसे हाथ पर साईकल का चलना
गिलहरी बिटिया को अब समझ में आया
दोनों ने मिलकर चटखारा लगाया
अफ़वाह
बेवक़ूफ़ हैं वे
जो गोला बारूद
खर्च करते हैं
ये आम आदमी हैं
अफवाह से भी मर जाते हैं
प्रेम क्या है?
जब आपकी
भूख मिटने की उम्मीद
चरमोत्कर्ष पर हो
उस क्षण में
जो सर्वप्रथम
आपके समक्ष प्रस्तुत हो
उसके प्रति आसक्ति ही प्रेम है
सांत्वना
किसी के सामने रो देने पर
मात्र सांत्वना मिलना
ठीक ऐसा ही एहसास कराता है
जैसा किसी के समक्ष
निर्वस्त्र हो जाने पर
सम्भोग का ना होना
बोल्ड लड़कियां
लड़कियां शर्ट का ऊपरी बटन खोलकर चलें
तो बोल्ड कहलाती हैं
लड़कियां कंडोम पर्स में लेकर चलें
तो बोल्ड कहलाती हैं
लड़कियां सेनेटरी नेपकिन की बातें करें
तो बोल्ड कहलाती हैं
लड़कियां लड़कों से खुलकर बातें करें
तो बोल्ड कहलाती हैं
लड़कियां तीसरी टांग से नज़र मिलाएं
तो बोल्ड कहलाती हैं
लड़कियां सिगरेट के धुएं उड़ाए
तो बोल्ड कहलाती है
लड़कियां मदिरा को फैशन बनाएं
तो बोल्ड कहलाती है
सच में,
कितना आसान है लड़कियों के लिए
बोल्ड हो जाना
क्या तुम्हें यकीन है?
बांध आए राखी
दे आए मिठाइयां, उपहार और चंद रुपये
क्या तुम्हें यकीन है
ये कर पाएंगे सालभर तुम्हारी बहन की रक्षा
तुम्हारी अनुपस्थिति में?
दे आए धरना
कर आए कैंडल मार्च
कर लिया फेसबुक की डीपी को ब्लैकआउट
क्या तुम्हें यकीन है
अब नहीं जन्मेगी अब कोई और निर्भया?
मूंद ली आंखें
गलत को देखकर
बर्दाश्त कर लिया अत्याचार
बन गए अच्छे सबकी नजर में
क्या तुम्हें यकीन है
सब स्वतः ही ठीक हो जाएगा एक दिन?
कर लिया प्रेम
बना लिया अर्धांगिनी
हो गए बच्चे
बना दिया उसे आया
क्या तुम्हें यकीन है
तुम इससे ज्यादा सशक्त उसे नहीं बना सकते?
लड़कियां विवाह कर लेती हैं!!!!
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि वे माता-पिता की चिंता का
कारण नहीं बनना चाहतीं
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि वे समाज की नज़रों का
शिकार नहीं होना चाहतीं
क्योंकि वे माता-पिता की चिंता का
कारण नहीं बनना चाहतीं
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि वे समाज की नज़रों का
शिकार नहीं होना चाहतीं
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि सदियों से
यही तो होता आया है
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि बाकि लड़कियां भी
यही करती हैं
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि उन्हें यह भ्रम हैं
कि विवाह उनके अस्तित्व के लिए
अनिवार्य है
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि वे यह भी जानती हैं
कि शिकारी घात लगाए तैयार हैं
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि उनके पास
कोई और विकल्प नहीं होता
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि उनका कोई और
लक्ष्य ही नहीं होता
ऐसी लड़कियां
विवाह के बाद ही समझ पाती हैं
कि विवाह कोई मंज़िल या लक्ष्य नहीं
बल्कि एक पड़ाव मात्र है।
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि उन्हें यह भ्रम हैं
कि विवाह उनके अस्तित्व के लिए
अनिवार्य है
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि वे यह भी जानती हैं
कि शिकारी घात लगाए तैयार हैं
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि उनके पास
कोई और विकल्प नहीं होता
लड़कियां विवाह कर लेती हैं
क्योंकि उनका कोई और
लक्ष्य ही नहीं होता
ऐसी लड़कियां
विवाह के बाद ही समझ पाती हैं
कि विवाह कोई मंज़िल या लक्ष्य नहीं
बल्कि एक पड़ाव मात्र है।
जंगल में नोटबंदी का असर
कोयल और चुहिया
बतिया रहे थे
सिंह साहब का आभार
जतला रहे थे
चुहिया बोली
सिंह साहब ने की अक्लमंदी
जो कर दी यहाँ नोटबंदी
नोटबंदी गर वे न करते
गद्दारों को कैसे पकड़ते
इन 8-10 ने ही देश को चूना लगाया
भीतर भीतर ही खोखला बनाया
बेकार ही हम सब पर शक करते थे
शेर, सियार, गीदड़ के लिए बद्दुआ करते थे
राजनीतिक पार्टियां तो हमारा हित करते हैं
उद्योग जगत हमारे लिए चलते हैं
फिल्मी दुनिया हमारा मनोरंजन है करते
राधे राम सब हमारा दुख हैं हरते
सुनो अमृता!
सुनो अमृता!
अच्छा हुआ
जो तुम लेखिका थी
क्योंकि अगर तुम लेखिका न होती
तो निश्चित तौर पर
तुम्हें चरित्रहीन और
बदलचलन की श्रेणी में रखा जाता।
अच्छा हुआ तुम असाधारण थी
क्योंकि साधारण स्त्रियों की ज़िंदगी में
तीन-तीन पुरुषों का होना
वैश्यावृत्ति माना जाता है
अच्छा हुआ अमृता
तुम बोल्ड थी
इसीलिए तुम्हारे मुंह पर
किसी ने कुछ न कहा
किन्तु यह भी सत्य है
आज इमरोज की कामना करने वाली
कोई भी स्त्री अमृता बनना नहीं चाहेगी
क्योंकि दहलीज़ों को लांघना
कोई मज़ाक नहीं है।
गलतियां
पुरुषों के लिए
पुरुष होना ही काफी है
उनकी गलतियों को
छिपाने के लिए
पर तुम्हें
कुछ विशेष ही करना होगा
इस हेतु
मन की
वह भी
पुरुष की तरह
जीना चाहती है
किन्तु उसे डर है
कि लोग उसे
वैश्या कहेंगे
वह बच सकती थी!!!
वह बच सकती थी
अगर वह चिल्ला सकती
उस दिन जब खेल खेल में
किरायेदार अंकल
उसे गोद मे उठा दुलारने लगे
और वह दुलार जब तकलीफदेह होने लगा
तब वह अगर चिल्ला पाती
तो वह बच सकती थी
संभवतः उसे पता ही नहीं था
कि चीख भी एक अस्त्र है
वह बच सकती थी
बार-बार अतिक्रमित होने से
अगर वह कहना जानती
उस दिन जब देर रात
घर वाले अंकल की उंगलियां
उसके अंगों पर
भयंकर तांडव करने लगीं
वह रोक सकती थी यह तांडव
अगर वह कह पाती
संभवतः वह नहीं जानती थी
कि कहना एक संजीवनी है
वह बच सकती थी
अगर उसे पढ़ाया गया होता
शरीर विज्ञान
ताकि वह समझ पाती
विभिन्न स्पर्शों का अंतर
खैर, उसकी छोड़ो
तुम तो जानती हो न बिटिया
चीखना, कहना और
स्पर्शों का अंतर?
गंदगी
मुझे गंदगी पसंद है
क्योंकि ये कभी
स्वच्छ दिखने का
प्रयत्न नहीं करते
26 जनवरी
26 जनवरी को
सब देशभक्त हो जाते हैं
नेता बड़ी ही शालीन भाषा में
वक्तव्य देते हैं
पुलिस थाने में बैठ
केस का इंतज़ार नहीं करती
बल्कि किसी भी केस की
संभावनाओं को ही खत्म कर देती है
सभी सरकारी विभाग
ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाते हैं
क्योंकि यह देश की
अर्थात उनकी प्रतिष्ठा का प्रश्न होता है।
26 जनवरी के बाद
सब पूर्ववत हो जाता है
नेता फिर से भौंकना शुरू कर देते हैं
पुलिस थाने में बैठ
केस का इंतज़ार करने लगती है
सभी विभाग
हड्डियां इकठ्ठी करने में जुट जाते हैं
क्योंकि अब प्रश्न
जनता की प्रतिष्ठा होता है
दायरा
गर वह आदिम युवा भी
संतुष्ट हो जाता
उन गुफाओं के जीवन से,
डर गया होता
समुद्र और पहाड़ियों के
उसपार की अनिश्चितताओं से,
तो क्या कभी वह ढूंढ पाता
उसके जैसे ही कुछ और लोग?
क्या वह कभी परख पाता
अपने दायरे की न्यायसंगतता को?
तुम्हें क्या पद्मावती
तुम तो चली गई
अपनी लाज बचा गई
क्या फर्क पड़ता है इससे तुम्हें
कि तुम्हारे बाद
कितनी पद्मावतियों की लाज गई
क्या अच्छा नहीं होता कि
तुम उसकी चुनौतियों को और बढ़ाती
खिलजियों का सफर आसान नहीं, एहसास कराती
पर तुमने तो उलटा उसके दुस्साहस को बढ़ाया
अन्य पद्मावतियों का मनोबल घटाया
इसीलिए, आज भी खिलजी बेखौफ घूमते हैं
जब चाहा, पद्मावतियों की लाज लूटते हैं
पर तुम्हें क्या पद्मावती
तुम तो बच गई
बेशक जौहर के नाम पर
आत्महत्या कर गई
तुम निश्चित ही सम्मान की हकदार होती पद्मावती
तुम निश्चित ही
सम्मान की हकदार होती पद्मावती
बशर्ते
तुमने सीता और अहिल्या की बजाय
द्रौपदी का अनुसरण किया होता
रानी झांसी की तरह लड़ा होता
माना कि नहीं थे तुम्हारे पास
पांडव जैसे अजेय तीर
माना कि नहीं थीं तुम
रानी झांसी जैसी वीर
पर यौवन तो था न तुम्हारे पास पद्मावती
जिसने राजा रतन सिंह को भरमाया था
जिसने खिलजी को ललचाया था
इसी यौवन रूपी अमृत को
विष में बदलती
खिलजी को इसी शस्त्र से कुचलती
तुम कैसे भूल गई अपने इस ब्रह्मास्त्र को
तुम कैसे भूल गई अप्सराओं के इतिहास को।
सम्मान की हकदार होती पद्मावती
बशर्ते
तुमने सीता और अहिल्या की बजाय
द्रौपदी का अनुसरण किया होता
रानी झांसी की तरह लड़ा होता
माना कि नहीं थे तुम्हारे पास
पांडव जैसे अजेय तीर
माना कि नहीं थीं तुम
रानी झांसी जैसी वीर
पर यौवन तो था न तुम्हारे पास पद्मावती
जिसने राजा रतन सिंह को भरमाया था
जिसने खिलजी को ललचाया था
इसी यौवन रूपी अमृत को
विष में बदलती
खिलजी को इसी शस्त्र से कुचलती
तुम कैसे भूल गई अपने इस ब्रह्मास्त्र को
तुम कैसे भूल गई अप्सराओं के इतिहास को।
माना, तुम्हें भय था
यौन शोषण और बलात्कार का
माना, तुम्हें भय था
इतिहास के तिरस्कार का
पर इस नज़र से भी सोचना था पद्मावती
देश से ऊपर नहीं होता कोई व्यक्ति
फिर दर्शन भी तो यही कहता है
शरीर से बढ़कर आत्मा की महत्ता है
तुम खुद भी तो सोचती
जब शरीर नष्ट होता है
आत्मा परलोक में, कर्म इहलोक में रहता है।
यौन शोषण और बलात्कार का
माना, तुम्हें भय था
इतिहास के तिरस्कार का
पर इस नज़र से भी सोचना था पद्मावती
देश से ऊपर नहीं होता कोई व्यक्ति
फिर दर्शन भी तो यही कहता है
शरीर से बढ़कर आत्मा की महत्ता है
तुम खुद भी तो सोचती
जब शरीर नष्ट होता है
आत्मा परलोक में, कर्म इहलोक में रहता है।
तुम ही कहो अब, कैसे तुम्हारा गुणगान करूँ
तुम ही कहो अब, कैसे तुम्हारा सम्मान करूँ।
तुम ही कहो अब, कैसे तुम्हारा सम्मान करूँ।
मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया
हम भाई-बहन में से
एक को ही अच्छा स्कूल मिल सकता था
वो स्कूल भाई को दे दिया गया
मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया
मुझे उच्च शिक्षा प्राप्त करनी थी
पिताजी को कन्यादान से मुक्ति की जल्दी थी
मेरा कन्यादान कर दिया गया
मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया
मुझे जीवनसाथी की तलाश थी
पतिदेव को स्त्री की ख्वाहिश थी
पहली ही रात मेरा अनावरण कर दिया गया
मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया
मैं अपना यौवन जीना चाहती थी
मेरी सास को पोते की चाह थी
मुझसे मेरा यौवन छीन लिया गया
मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया
बेटे की उड़ने की इच्छा थी
मैं अब सच में दुविधा में थी
मेरे ख्वाबों को उधेड़ पंख बना दिया गया
मुझसे एक बार भी नहीं पूछा गया
एक दिन सभी स्त्रियाँ नग्न हो जाएंगी
तुम जानते हो
स्त्रियों को अपनी देह से प्रेम होता है
उनकी जान उनकी देह में ही होती है
इसीलिए वे इसे सजाती सँवारती
और सलीके से ज़ाहिर करती हैं
वे कभी भी पूर्णतः नग्न नहीं होतीं
तुम फिर भी उसकी मर्जी के बिना
बार-बार उसकी देह कब्जाते हो
उसपर महाभारत रच जाते हो
पर क्या कभी तुमने सोचा है
अगर उनका देह प्रेम खत्म हो जाए
उन्हें नग्न होने में आनंद मिलने लग जाए
देह की भूख उनमें भी जग जाए
और वे भी नित नई देह पर
महाभारत रचने लग जाए
तुम चंद सेकंड भी नहीं टिक पाओगे
दस दस मिलकर भी उसकी भूख नहीं मिटा पाओगे
तुम सोच रहे होगे कि खरबूज छुरी पर गिरे
या छुरी खरबूज पर
बात तो एक ही रहेगी
पर तुम विज्ञान शायद भूल गए
सिर्फ गिरना ही काफी नहीं होता
किस तरीके से गिरा
यह भी महत्वपूर्ण होता है
बेतरीक़े से गिरा खरबूज
छुरी की धार तक को तोड़ सकता है
उसे पंगु भी कर सकता है
स्त्रियां भी जब नग्न हो जाती हैं
तो बेतरीक़े ही गिरती हैं
क्योंकि नग्न स्त्रियां
पशु से भी अधिक खूँखार हो जाती हैं
अगर यह सिलसिला न रुका तो देखना
एक दिन सभी स्त्रियां नग्न हो जाएंगी
रहस्य
तुम्हारी देह के भूगोल का
मानचित्रण करके
वह तुम्हें तंग तो कर सकता है
किन्तु नियंत्रित नहीं
क्योंकि तुम्हारी जंघा के तिल से
यह बिलकुल भी पता नहीं चलता
कि तुम किस बात पर हँसती हो
तुम किस बात पर रो देती हो
तुम कब उदास हो जाती हो
तुम कब चहचहा उठती हो
तुम कब मौन जो जाती हो
तुम कब क्रोध से भर जाती हो
तुम कब कमजोर और लाचार हो जाती हो
और तुम कब सशक्त हो पलटवार करती हो
क्योंकि देह इंद्रियों के प्रभाव में होता है
और इंद्रियां मन के प्रभाव में।
स्त्रियों की वास्तविक समस्या
आखिर क्या है स्त्रियों की वास्तविक समस्या?
सार्वजनिक स्थलों पर स्तनपान कराना?
खुद को बहुत सुंदर बनाना?
अंगों को मनपसंद कपड़ों से आकर्षक बनाना?
सेनेटरी नेपकिन न खरीद पाना?
मनपसंद साथी को जीवनसाथी बनाना?
अपने तरीके से संभोग कर पाना?
नही, बिलकुल नहीं
उनकी वास्तविक समस्या है
किसी अनजान पुरूष को देखकर
मन आशंकाओं से भर जाना
और फिर देखते ही देखते
उनका पुरूष हो जाना।
प्यार
तुम्हें लगता है
कि वो तुम्हें प्यार करता है
तो ठीक है
एक काम करो
अपने स्तनों को
काटकर फेंक दो
अपनी योनि को
सील कर दो
और अब देखो
क्या वह अब भी
तुमसे प्यार करता है?
मुझे अपनी जरूरतें पसंद हैं
मैं तुम्हें चाहता हूँ या नहीं
नहीं जानता
किन्तु रात को जब तुम्हारी ओर
करवट लेता हूँ
और मेरे हाथ तुम्हारा स्पर्श नहीं पाते हैं
तो मैं चौंक जाता हूँ
मेरी आँखें खुल जाती हैं
और तलाशने लगती है तुम्हें
चारों तरफ
मुझे तुम्हारी कमी महसूस होती है या नहीं
नहीं जानता
किन्तु मित्रों के लाख कहने पर भी
किसी पार्टी या पिकनिक पर नहीं जाता
बाज़ार का कोई भी आकर्षण
मुझे बांध नहीं पाता
ऑफिस से निकलते ही
बस दौड़ पड़ता हूँ
घर की ओर
मैं तुम्हें मानता हूँ या नहीं
नहीं जानता
पर जब तुम किसी चीज की
डिमांड करती हो
और मैं उसे चाहकर भी पूरा नहीं कर पाता
तो मैं अपने सामर्थ्य को
बढ़ाने में जुट जाता हूँ
जी जान से
मैं तुम्हें ठीक से जान पाया या नहीं
नहीं जानता
पर इतना अवश्य कह सकता हूँ
कि मैं जब जब कहीं दूर
बल्कि बहुत दूर
जाने के लिए कदम बढ़ाता हूँ
मेरी आँखों से आँसू बरसने लगते हैं
कदम कांपने लगते हैं
मन अशांत हो जाता है
मेरी ज़िंदगी में तुम क्या मायने रखती हो
नहीं जानता
पर इतना अवश्य जानता हूँ
कि हार और जीत के द्वंद्व में
मैं जब जब गिरता या उठता हूँ
मेरी निगाहें तुम्हें ही तलाशती हैं
हाँ, यह सच है
मैं नहीं जानता
प्रेम और जरुरत में फर्क
किन्तु यह भी सच है
कि तुम मेरी जरुरत हो
और मुझे
अपनी जरूरतें पसंद हैं
शुक्रिया
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