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मोल भाव

ममता दीक्षित शुक्ला




दीपक रोज की तरह जल्दी-जल्दी टीवी के सामने नाश्ता कर रहा था। एक हाथ में रिमोट और दूसरे हाथ में चाय का कप। अचानक कप होंठों तक लाकर ठिठक गया। आँखें उसने समाचार चैनल पर गड़ा दीं। "लो, अब फिर से डांस बार खुलने जा रहे हैं। ये नेता भी न! वोट के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। फिर वही लड़कियों का शोषण! छोटे-छोटे शहरों से नौकरी के नाम पर बहला-फुसलाकर लड़कियों को लाना और डांस बार में....छी!" गुस्से में उसका चेहरा तमतमा गया। "साब पंखा चालू कर दूँ? पोंछा जल्दी सूख जाएगा।" बीस साल की कमली ने जब आवाज लगाई तब उसका ध्यान टूटा। इधर गीला फर्श पंखे की हवा से सूखता जा रहा था, उधर दीपक का कंठ पोछा लगाती कमली के कुर्ते के गले में उलझ सूखता जा रहा था। उसने झट से मोबाइल निकाला और अपने सेक्रेट्री से कहा, "सुनो! ज़रा जरूरी काम आ गया है। मीटिंग एक घंटे डिले कर दो!" "सुन कमली! तुझे अल्का से एक महीने के कितने मिलते हैं?" "क्यू साब? तीन हजार।" "ले रख, लौटाने और किसी को कहने की जरूरत नहीं। दरवाजा बंद कर दे।" कहते हुए दीपक ने पर्स में से दो हजार के दो नोट टेबल पर रख दिए। "एक बात बोलूँ साब! दिल का राजा आदमी है तुम। वाज़िब दाम लगाता है।" शर्ट का बटन खोलते हुए, "हम्म!" "अपना बड़ा वाला बेटा को थोड़ा ज्यादा पैसा दिया करो न साब। वो मोल-भाव बहुत करता है।" शर्ट का बटन एक लूप में वहीं अटक गया। उसने सकपका के कार की चाबी उठाई और बिजली की गति से दरवाज़े के बाहर निकल गया। कमली ने मुस्कुराते हुए पंखा बंद किया और टीवी का चैनल बदल दिया।

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