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शायद कोई पागल रहा होगा !

गौरव भारती



एक अधेड़ इंसान
लंगड़ाते हुए चल रहा था
चलते चलते रुक रहा था
लगा रहा था हिसाब
अपनी गंदी, लंबी सिकुड़ी उँगलियों पर
न जाने किस चीज का

मैंने रूककर पूछा -
‘क्या गिन रहे हो’
उसने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोला
मेरी खद्दर झोली पर आँख गड़ाए
मुँह चबाते हुए बोला -
‘दिखता नहीं क्या
सड़क नाप रहा हूँ
दूर-दूर तक फैली सड़क
लंबी-चौड़ी सड़क
रोज नापता हूँ
मेरे साथ नापोगे तुम भी
रहने दो तुमसे न होगा’

मैले, बेतरतीब बाल खुजाते हुए
रूककर उसने एक सवाल पूछा -
लेखक हो क्या?
मैंने हँसकर कहा -
‘हां, लिख लेता हूँ, कोशिश में हूँ
लेकिन तुमने कैसे पता लगाया’
सवाल काटते हुए उसने फिर पूछा -
‘किस जमात के लेखक हो?
मने किसके लिए लिखते हो?
कौन-सा झंडा?’
अकबकाते हुए मैंने कहा -
‘सबके लिए लिखता हूँ
लेखक हूँ, नेता नहीं’
उसने हँसते हुए कहा -
‘फिर दो कौड़ी के लेखक हो तुम
चलो, मेरी तरह सड़क नापोगे?
बहुत मजा आएगा’

‘मैं चिढ गया
थोड़ा खुद को सँभालते हुए
उम्मीद की मोमबत्ती जलाई
और बोला - ‘एक दिन मुझे पढ़ा जाएगा
तुम देख लेना
अच्छे पाठक जिन्दा हैं अभी
वे पढ़ेंगे मुझे
तुम देख लेना’
उसने एक सलाह दी
अपने गाल को लंबे नाखूनों से खुजाते हुए
हँसते हुए बोला -
‘कोई झंडा थाम लो’
मैंने पूछा –
‘तिरंगा?’
उसने कहा - ‘वो तो दो रूपए में मिलता है’
उसने कहा - ‘अरे कोई भी,
जिसकी बाजार में कीमत ज्यादा हो
अब तुम तो लेखक हो
ज्यादा पता होगा
मैं तो सड़क नापता हूँ
लंबी-लंबी सड़क
दूर तक फैली सड़क
हर जगह की सड़क एक जैसी नहीं होती
जैसी सड़क, वैसे लोग
जितनी अच्छी सड़क,
उतनी रफ़्तार
लोग रुकते कहाँ है तुम्हारी तरह इन सड़कों पर
मुझे भी यह सड़क पसंद नहीं
कोई नहीं रुकता
गुम हो जाते हैं
क्षणभर में पता नहीं कहाँ
देहाती सड़कों पर चलते हुए लोग गुम नहीं होते
यूँ अचानक
उन्हें देख सकते हैं जाते हुए
मुझे वे पसंद हैं
तुम्हें कौन-सी सड़क पसंद है?’
उसने फिर पूछा

मैं चुप था
खामोश था
उलझ रहा था कहीं
कि अचानक उसने पूछा -
‘मुझे नायक बनाओगे तुम
अपनी कहानी का?
कैसे गढ़ोगे मुझे?
मेरे किरदार को?
मैं तो बस सड़क नापता हूँ
लंबी-चौड़ी सड़क
तरह-तरह की सड़क

मैं पलट रहा हूँ पन्ने सौन्दर्यशास्त्र के
गुण नायक के देख रहा हूँ
वह किरदार अभी भी
अनगढ़ है
उसके सवाल
गूंज रहे हैं
मेरे भीतर के नेपथ्य में
और बाहर एक ही जवाब है -
शायद, कोई पागल रहा होगा।

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