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संतोष श्रीवास्तव की कविताएँ

आंदोलिता हवाएँ
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ये आंदोलिता हवाएँ
टिकने न देंगी मोम पर
जलती, थरथराती लौ

अंधेरे से निपटने की
तमाम कोशिशें
नाकाम करने पर उतारू
इन हवाओं का
नहीं कोई ठिकाना

गुज़रती जा रही हैं
कुसुम दल से, डालियों से,
झील के विस्तार को झकझोरती

मोम के आगोश में
लौ का बुझता, मरता अस्तित्व
पर यह उतना आसान भी न था

सम्हाल रखा है
एक आतुर प्रण लिए
तरल मोम ने बूँद सी लौ को
लड़ने की पूरी ताकत से
एक आंदोलन हवा के खिलाफ
वहाँ भी तो था

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आर्त्त पुकार
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मैंने अरमानों के कुछ बीज
अपनी मुट्ठी में दबा रखे हैं
और आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूं
मौसम की दस्तक का

चारों ओर नि:शब्द सन्नाटा है
पानी की एक बूंद तक नहीं
आषाढ़, सावन,भादो
भरोसा दिलाते रहे
कहीं धुनके हुए
कहीं सिलेटी बादलों से
हवा संग छितराते रहे
पर बरसे नहीं

सूखी, पपड़ाई धरती
करती रही प्रतीक्षा
अपने प्रियतम बादलों के
बरसने का
कोख में दबे बीजों के
झुलस जाने की आशंका
धरती का कलेजा
कर रही चूर चूर

आता तो रहा है अब तक
मौसम सिलसिलेवार
इस बार क्या हुआ
मौसम की आवाजाही को

बूढ़ी धरती की आर्त्त पुकार
असीम व्याकुलता
मृत हुआ परिवेश
फिसल रहे हैं
मेरी उंगलियों की रंध्रों से
अरमानों के बीज

कि जैसे मृत हुई धरती
मेरे अंदर समा रही है
कि जैसे मैं भी
संज्ञाशून्य हो रही हूं
कि जैसे लीलने को
आतुर है समग्र
बिगड़ा बौखलाया
प्रकृति का संतुलन





अंधेरे पर मोहर
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कुछ दीप जले
रोशनी की मोहर लगी
अंधेरे की बही पर
अपने अंत पर भी
खुश है अंधेरा

उसकी मौजूदगी में
हुए गुनाहों ने उसे
बदनाम कर दिया है
वरना बुरा नहीं है अंधेरा

थकान को आराम दे
समेट लेता है अपनी बाहों में
अंधेरे में खिलता है
हरसिंगार, रातरानी
अंगड़ाई लेता है प्रेम
जो विश्व की किसी भी
करेंसी से अधिक कीमती है

प्रेम के संग
हरे हो जाते हैं सूखे पेड़
खिल पड़ती है
सरोवर में कुमुदिनी

तारों का काफिला
चल पड़ता है विश्व के
अनंत विस्तार में
अंधेरे ने दिए हैं
अनंत आकाश
आकाश गंगाओं को

फिर भी वह खुश है
रोशनी की मोहर से
वह जानता है
वह होगा, तभी होगी रोशनी




डरने लगा है आकाश
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मैं ढूँढ रही हूँ
अपना आकाश
जो मुझ में जीता था
वह मुझे आश्वासन देता था
कि समेट लेगा मुझे
अपने वितान में
देगा ताप सूरज का
मेरी ठंडी जड़
आकांक्षाओं को
एक रुपहली रात भी
जिसमें लगेंगे
ख्वाबों को पर

लेकिन वह घबराकर छुप गया
शायद यह सोच कर
कि ख्वाबों को पर लगेंगे
तो वे उड़ेंगे और छू लेंगे उसे
जबकि उसे रहना है सबसे ऊँचा

सबसे ऊँचा रहने की चाह में
अक्सर खो जाती है पहचान
उलझन बनकर
रह जाता है अस्तित्व
सोचती हूँ
स्वप्नदंश की पीड़ा से
क्या डरने लगा है आकाश?





मुश्किल है समझना
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मैं तब भी नहीं
समझ पाई थी तुम्हें
जब सितारों भरी रात में
डेक पर लेट कर
अनंत आकाश की
गहराइयों में डूबकर
तुमने कहा था
हां प्यार है मुझे तुमसे

समुद्र करीब ही गरजा था
करीब ही उछली थी एक लहर
बहुत करीब से
एक तारा टूट कर हंसा था
तब तुमने कहा था
हां प्यार है मुझे तुमसे

जब युद्ध के बुलावे पर
जाते हुए तुम्हारे कदम
रुके थे पलभर
तुमने मेरे माथे को
चूम कर कहा था
इंतजार करना मेरा

तुम्हारी जीप
रात में धंसती चली गई
एक लाल रोशनी लिये

मुझे लगा
अनुराग के उस लाल रंग में
सर्वांग मैं भी तो डूब चुकी हूं

हां मैं बताना चाहूंगी
तुम्हारे लौटने पर
कि तुम्हारी असीमित गहराई
तुम्हारी ऊंचाईयों
को जानना
मेरी कूबत से परे है
मैंने तो तुम्हारी
बंद खिड़की की दरार से
तुम्हें एक नजर देखा भर है
और बस प्यार किया है



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