सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

आधार

ललित कुमार मिश्र


शनिवार का दिन था। सप्ताह का आखिरी दिन। इस वीकेंड में भी सुनील और रमेश ने नेचर वॉक की योजना बनाई थी। सुनील ने रमेश को आधार केंद्र पर ही बुला लिया था। इंतज़ार की घड़ी बढ़ती देख रमेश ने सुनील से पूछा, "और कितने फॉर्म बाकी है?"
"बस यार, ये लास्ट है।"
"अच्छा तो एक काम कर, ये फॉर्म मैं भर देता हूँ, तू फ्रेश हो जा इतने।"
"अच्छा ठीक है।" सुनील ने रमेश को अपनी कुर्सी दे दी और वाशरूम की ओर बढ़ गया। इधर रमेश की उँगलियाँ कंप्यूटर के की-बोर्ड पर नर्तन करने लगीं। सुनील जब तक लौटकर आया, रमेश अपना काम निपटा चुका था। "मैंने सारा परफेक्ट टाइप कर दिया है। दो बार चेक भी कर लिया है। तुझे बस एंटर मारना है।"
सुनील ने पूरे फॉर्म पर नज़र दौड़ाई और फिर नाम में थोड़ा बदलाव कर एंटर मार दिया। रमेश आश्चर्य से बोला, "अबे नाम ठीक तो था! गलत कर दिया तूने। अब दोबारा बेचारे को आना पड़ेगा और 50 रुपये देने पड़ेंगे अलग।" 
रमेश की बात सुन सुनील मुसकराया और बोला, "अबे अगर इनका आधार पहली बार मे ही ठीक करके देंगे तो हमारा आधार तो बिगड़ जाएगा न!"

टिप्पणियाँ

  1. आजकल के परिवेश में ऐसा ही हो रहा है। पता नही कब तक होता रहेगा। अतिउत्तम लघु कथा।

    जवाब देंहटाएं
  2. असलियत में यही हो रहा है... बेहतरीन लघुकथा

    जवाब देंहटाएं

एक टिप्पणी भेजें

चर्चित रचनाएँ

संतोष श्रीवास्तव की कविताएँ

आंदोलिता हवाएँ -------------------- ये आंदोलिता हवाएँ टिकने न देंगी मोम पर जलती, थरथराती लौ अंधेरे से निपटने की तमाम कोशिशें नाकाम करने पर उतारू इन हवाओं का नहीं कोई ठिकाना गुज़रती जा रही हैं कुसुम दल से, डालियों से, झील के विस्तार को झकझोरती मोम के आगोश में लौ का बुझता, मरता अस्तित्व पर यह उतना आसान भी न था सम्हाल रखा है एक आतुर प्रण लिए तरल मोम ने बूँद सी लौ को लड़ने की पूरी ताकत से एक आंदोलन हवा के खिलाफ वहाँ भी तो था ****** आर्त्त पुकार ++++++++ मैंने अरमानों के कुछ बीज अपनी मुट्ठी में दबा रखे हैं और आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूं मौसम की दस्तक का चारों ओर नि:शब्द सन्नाटा है पानी की एक बूंद तक नहीं आषाढ़, सावन,भादो भरोसा दिलाते रहे कहीं धुनके हुए कहीं सिलेटी बादलों से हवा संग छितराते रहे पर बरसे नहीं सूखी, पपड़ाई धरती करती रही प्रतीक्षा अपने प्रियतम बादलों के बरसने का कोख में दबे बीजों के झुलस जाने की आशंका धरती का कलेजा कर रही चूर चूर आता तो रहा है अब तक मौसम सिलसिलेवार इस बार क्या हुआ मौसम की आवाजाही को बूढ़ी धरती ...

वर्जिन

ललित कुमार मिश्र मैं वर्जिन हूँ विवाह के इतने वर्षों के पश्चात् भी मैं वर्जिन हूँ संतानों की उत्पत्ति के बाद भी। वो जो तथाकथित प्रेम था वो तो मिलन था भौतिक गुणों का और यह जो विवाह है यह मिलन था दो शरीरों का मैं आज भी वर्जिन हूँ अनछुई स्पर्शरहित। मैं मात्र भौतिक गुण नहीं मैं मात्र शरीर भी नहीं मैं वो हूँ जो पिता के आदर्शों के वस्त्र में छिपी रही मैं वो हूँ जो माँ के ख्वाबों के पंख लगाये उड़ती रही मैं वो हूँ जो पति की जरूरतों में उलझी रही मैं वो भी हूँ जो बच्चों की खुशियों के पीछे दौड़ती रही। मैं अब वर्जिन नहीं रहना चाहती मैं छूना चाहती हूँ खुद को।