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शिखा सिंह भारद्वाज की कविताएँ

(1)
फिर भी मैं परायी हूँ

बहू.... ओ बहू.....
सुन तो जरा
मेरे कमरे में से
चश्मा तो लाना,
जी.... माँ जी...

क्षण बीते फिर सुनती हूं मैं

बहू.... ओ बहू.....
सुन.... दो कप
चाय बना ला
उसके साथ पकौड़े भी
तल लें.. वो भी गोभी के
जी..... माँ जी.....

वक्त का पहिया घूमे जैसे
वैसे मैं भी घूमा करती

बहू.... ओ बहू.....
सुन तो.....
रागनी के काॅलेज जाने का
वक्त हो चुका है
उसे अपना लाल वाला
पर्स तो दे दे।
जी..... माँ जी.......

मेरे किस्मत की क्या
यही नीति है?...
या हर बहू की यही रीति है...

बहू .... ओ बहू.....
'राहुल के पापा आए हैं '
उनके लिए खाना तो
लाकर दे दे।
जी.... माँ जी....

मुझे मेरे घर से यही सीख मिली हैं
सास-ससुर माँ और पिता से बढ़कर है...

बहू.... ओ बहू.....
स्कूल की छुट्टी हो गई होगी
बस आ गई होगी
जा बच्चों को ले आ
जी..... माँ जी....

कहाँ थी पहले, अब कहाँ खड़ी हूँ
ये सोच-सोच खुद से डरी हूँ

बहू.... ओ बहू.....
सुन.... रात के खाने पर
राहुल की मौसी आ रही है
खाना थोड़ा चटपटा बनाना
रायता, गोभी के पराठे, गाजर का हलवा,
धनिए की चटनी और...
जो तू ठीक समझे, बना लेना
बिगाड़ मत देना
जी..... माँ जी.....

माँ ने सिखा दिया था,
तू आज से हुई पराई है
जो करना वो सोच-समझकर
क्योंकि तू हो चुकी पराई है

बहू.... ओ बहू.....
जी..... माँ जी....
खाना खालो माँ जी मेरी
मैंने परोस दिया है
केसर वाला दूध भी
मैंने गरम किया है

सुनकर बहू की बात सास ने
मुँह को यूँ सिकुडाया

सुन! बहू तू बहू ही रहेगी
किसी ने तुझे नहीं बतलाया

 सास की अकड़न देख
बहू ने साधी मुँह पर चुप्पी

अरे....
रोज़ - रोज़ की यही थी हालत
रोज़ - रोज़ आती थी सामत
कुछ भी कर लूं, लाख कोशिशें
बेटी न समझी जाऊंगी
जान भी दे दूं अपनी
फिर..... भी....
मैं पराई कही जाऊंगी।



(2)
सीता की अग्निपरीक्षा कब तक...

अब ये प्रश्न मैं किससे पूछूँ
जो सदियों से मन में आयी है
विश्व पटल के घर - घर में
स्त्री पर, ये प्रश्नचिन्ह बन छायी है
क्योंकि.....
न स्वतंत्र उसकी काया है
न स्वतंत्र उसकी छाया है
सहना है.. बस बिन बोले
मैंने उसे अब तक .....
परतंत्रता में ही पाया है
जब......
सतयुग,  द्वापर   बीत  चुके
तब भूमिपुत्री का जनम हुआ
निकली हल के सीत शिखर से
त्रेता में सीता उसका नाम हुआ

जनकपुर की जनकनंदनी ने
बाल्यावस्था में चमत्कार दिखलाया था
शिव के प्राचीन धनुष को
खिलौने की तरह उठाया था
इस कारण से जनक ने स्वयंवर रचाया था
फिर...
विष्णु रूप राम ने सीता को
अपने बाहुबल से पत्नी बनाया था
लक्ष्मी रूप सीता ने राम पर
अपना सर्वस्व निःस्वार्थ लुटाया था
और...
जिसके सतीत्व से भय खाकर रावण डरा था
हरण तो कर लाया पर, सीता से दूर खड़ा था
माया ने माया को माया दिखलाई कर डाला विध्वंस
किया चूर उसका घमंड जो अपनी जिद्द पर अड़ा था
वन में.....
हनुमान, सुग्रीव, जामवंत और बहुत वानर थे
करी सहायता नारायण की देख सभी स्तब्ध थे
दशमुख धूल बना गिरा धरती पर राम-राम बस राम
सीता ने दी जब अग्निपरीक्षा देख सभी प्रसन्न थे
फिर...
रामराज्य में सब खुश, वैभव ऐश्वर्य आया था
पर स्त्री के चरित्र पर धोबी ने प्रश्नचिन्ह लगाया था
राम के मर्यादित होने पर ये प्रजा ने प्रश्न उठाया
निर्दोष सीता को बिन बोले जंगल भिजवाया था

आज भी ऐसा हर जगह ये देखा जाता
स्त्री के कोरे चरित्र पर क्यों प्रश्न है लग जाता
न जाने कब तक.......? देनी होगी.......
सीता को अग्निपरीक्षा
न जाने कब तक.......? वो होगी.....
हर सोच में वो स्वतंत्र
न जाने कब तक......? उसे मिलेगा......
स्त्री होने का अस्तित्व
पर..... आज भी प्रश्न ये उठता है कि
क्या....?
खुली हवा में साँस सीता ले पाएगी!!


(3)
बुढापे की सनक

मन में उठा एक सवाल
जा बैठा आइने के पास
घंटों बैठे देख रहा था.....
खुद को देख ये सोच रहा था

मैं धीरे-धीरे हो जाऊँगा बूढ़ा
फिर हर जगह मिलेगा मूढा
क्या? कर पाऊँगा मैं मस्ती
जब हो जाऊँगा, सनकी बूढ़ा

फिर.....
मेरी उम्र हो जाएगी कुल 60 की
बेटे की हो जाएगी.. उम्र बाप की
फिर धीरे-धीरे सब धुंधला दिखेगा
जरूरत पड़ जाएगी नकली दाँत की

हर बात पर हम यूं ही रूठ जाएंगे
बच्चों की तरह फिर हमें नहीं मनाएंगे
कोई कहेगा कुछ और कोई हँसेगा कुछ
मेरी गलतियों को बुढापे की सनक बतलाएंगे

नहीं.... नहीं.... चेतना हो आई है अब मुझे
हम जैसा करेंगे, वैसा ही अपने बच्चों से पाएंगे
बुढ़ापे की ये दशा सबको देखनी है.........
फिर माँ - बाप को वृद्धाश्रम क्यों लेकर जाएंगे

बच्चों को हम जैसा सिखाएँगे
घर से हम बाहर जैसा दिखाएंगे
बन जाएंगे वैसे ही, वो तो कोरा कागज है
जिस राह को हम उनके लिए आसान बनाएंगे

सीख लेने दो दुनिया बहुत बड़ी है
दादा, नाना चाचा, मामा के रिश्तों से भरी है
जिसमें न कोई बुढ़ापे की सनक है
न विचारों की बंदिशें, उड़ने दो नभ चिडियों से भरी है


(4)
किधर को अब जाऊँ मैं....

पंछी बन उड़ जाऊँ मैं
दूर क्षितिज छूँ आऊँ मैं
बोल.... बोल ऐ मेरे मन
किधर को अब जाऊँ मैं

दूर व्योम वो खिड़की देखो
खुद में झांक वो मकड़ी देखो
हृदय - हृदय अब जकडेगा वो
टूटी हुई वहाँ वो खिड़की देखो

प्राण पखेंडू उड़ान भरेगा
बन साथी अब जान भरेगा
हर माया से रंगी है.. माया
हर पंछी फिर परवाज़ भरेगा

जन्म-मरण की रीत अनोखी
तेरी - मेरी ये प्रीत अनोखी
ईश्वर रमता है कण-कण में
हर मौसम की जीत अनोखी



(5)
क्या यही प्यार है.....

तेरे साथ जीना हो
या.....
तेरे साथ मरना हो
थोड़ी-सी खुशी में
लाखों दर्द सहना हो
चाहे कुछ भी हो
मैं रहूँगा तेरे साथ में
ये दिल कहता है मुझसे
क्या यही प्यार है......

तेरे आँसू मेरे हो
और......
मेरे ग़म तेरे हो
चाहे कुछ भी हो
मैं रहूँगा तेरे साथ में
ये दिल कहता है मुझसे
क्या यही प्यार है.......

बारिश में, मैं खड़ा रहूँ
और......
मुझे देख तुम भीगती रहो
फिर भी मैं प्यासा रहूंँ
चाहे कुछ भी हो
मैं रहूँगा तेरे साथ में
ये दिल कहता है मुझसे
क्या यही प्यार है......

अगर कभी एक-दूसरे से बिछड़े
तो......
जनाज़ा तेरा हो और दफ़्न हो जाऊँ मैं
एक ही कब्र पर नाम हमारा हो
चाहे कुछ भी हो
मैं रहूँगा तेरे साथ में
ये दिल कहता है मुझसे
क्या यही प्यार है.......

मैं हवा बन जाऊँ
और.....
तू खुशबू बन मुझसे लिपट जाए
मेरे साँसों की महक बन जाए
चाहे कुछ भी हो
मैं रहूँगा तेरे साथ में
ये दिल कहता है मुझसे
क्या यही प्यार है......

फिर.......
मुस्कुराएंगे नन्हें होठों पर
बनकर खुशी
जीत लेंगी इस दुनिया को
नन्हें हाथों की नमी
चाहे कुछ भी हो
मैं रहूँगा तेरे साथ में
ये दिल कहता है मुझसे
क्या यही प्यार है..... 

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