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डॉ. तरुणा दाधीच की लघुकथाएँ

1-  हिस्से का समय
     
ओ...ओ..ओ....गाते हुए और घुटने को हिला रही सृष्टि की नजर फोन पर गढ़ी थी और दोनों हाथों से मैसेज टाईप करने में इतनी व्यस्त हो गई की गोद में सो रही नीरा को भूल ही गयी।ऐसा अक्सर होता रहता, व्यस्त दिनचर्या के कारण सृष्टि परिवार और दोस्तों से थोड़ा कट सी गयी थी, तो जब बच्ची को सुलाने आती तब फोन को देखना उसके लिए तय कार्य रहता।सृष्टि की नज़र जब नीरा पर पड़ी तो स्फारित नेत्रों से मानो कुछ प्रश्न कर रही उसे अनिमेष देख रही थी, सृष्टि ने आँखें दिखाकर सुलाना चाहा पर बहुत देर तक जगी रही।अगले दिन फिर वही देख सृष्टि ने कुछ विचार कर फोन को एक ओर रख उसे थपथपाने लगी।सृष्टि अवाक् थी, देर तक सोने वाली नीरा आज इतना जल्दी सो गई,जब उसने देखा नीरा के चेहरे पर  संतुष्टि का भाव और छोटे से होंठों पर लम्बी सी मुस्कान है, सृष्टि को समझते देर नहीं लगी कि वह उसका सारा ध्यान स्वयं पर चाहती थी।आज जब नीरा को सुलाने गयी तो ,नीरा ने बिना विलम्ब किये फोन पर चल रहे हाथ को पकड़कर अपने ऊपर रख लिया और करुण नेत्रों से उसे देखने लगी,मानो पूछ रही हो ,मेरी क्या गलती हैं जो आप मेरे हिस्से का समय फोन को दे रही हो......


2-   'अनुसरण'

फाटक को खुला देख मेरी दो वर्षीय जुड़वां बेटियाँ दौड़ पड़ी। संध्या आरती के नियम के जैसे उन्हें रोज़ गार्डन ले जाना मेरी दिनचर्या में शामिल था।
फाटक को खोल प्राम को मोड़ रही थी तब तक दोनों सामने घर की फाटक तक पहुंच गई, उन्हें भागता देख डर के मारे आवाज तक नहीं निकली, मैं खुद को कोसती हुई, भगवान को धन्यवाद देती हुई उनकी ओर बढ़ रही थी कि कोई तेजी से गाड़ी नहीं आई अन्यथा क्या हो जाता।
वहाँ जाकर देखा दोनों फाटक के पास पड़े सिगरेट के टुकड़े उठा रही है, सामने वाले घर में कुछ मनचले लड़के रहने आए थे और अभी फाटक के पास ही खड़े थे।
उन लड़कों को मेरी बेटियां बालकनी से सिगरेट पीते देखती थी जो आज अवसर देख दौड़ पड़ी, गुस्सा तो दोनों पर बहुत आ रहा था पर अन्दर गटक  कर उनके हाथों से छिनते हुए लड़कों की तरफ देखकर बोली... ये बहुत गन्दी है और इसे गन्दे लोग ही रखते हैं.. लड़के नज़र नीचे कर सब सुन रहे थे...
मैंने बोला 'बेटा तुम लोगों को देखकर ही ना जाने ऐसे कितने बच्चे हैं जो  यह सब सिख जाते हैं।'
कह कर आगे बढ़ गई... मन में अलग सी खुशी थी... कि शायद उन बच्चों को कुछ समझ आ जाएगा।


3- 'रिश्ता'

हाई -फाई चॉइस वाले हसबैंड के साथ स्नेहा का एडजेस्टेबल जीवन चल रहा था ।जहाँँ स्नेहा सरल स्वभाव और आदर्श व्यवहार को जीवन का अंग मानती थी वहीं उसका पति रॉबिन ,दिखावटी और उग्र स्वभाव का धनी था।दोनों शारीरिक तो दूर मन से भी नहीं मिल पा रहे थे।रॉबिन का फोन एडिक्शन दोनों के रिश्तों में तनाव ला रहा था।स्नेहा ने रॉबिन को हर तरीक़े से समझाया, शारीरिक संबंध की अगुवाई की पर रॉबिन स्नेहा के साथ फोन पर सब कुछ देख लेने के पश्चात कुछ भी करने को तैयार नहीं था।पर जो हो नहीं सकता, जो जैसा है वैसा स्वीकार करो को अपनाकर स्नेहा ने  छोड़ दिया, और शहर के अच्छे स्कूल मेंं  जॉब शुरू कर दी। अब स्नेहा अपने स्कूल ,सास-ससुर के साथ व्यस्त हो गई।दूसरों के सामने दोनों हंस कर प्रस्तुत होते पर स्नेहा को अजीब घुटन हमेशा रहती।
  आज स्नेहा के स्कूल में एनूअल फंक्शन था,स्नेहा सिल्क की प्यारी सी साड़ी ,बड़ी सी बिंदी और स्ट्रेट बालों में बहुत सुंदर लग रही थी।बस जाने ही वाली थी,रॉबिन ने उसका हाथ पकड़ लिया,एक पल स्नेहा रुकी पर अगले ही पल उसने हाथ झिड़क लिया, जो स्नेहा रॉबिन से बातचीत करने को लालायित रहती, वह उसकी तरफ देखना भी पसंद नहीं करती।पर प्रेम की प्रतिमूर्ति नारी के समक्ष जब कोई अपना प्रेम प्रस्तुत करता है तो वह समर्पण कर देती,पर स्नेहा अब कुछ नहीं करेगी।सोच कर वह रॉबिन से बोली," रॉबिन बात करना या और कुछ करने का समय खो चुके हो"।
और वहाँ से चली गईं।


4- 'प्रॉमिस'

सिगरेट की बुरी लत ने विनोद की जीवनशैली को कायापलट ही कर दिया।सिगरेट और उसका साथ धरती पर सूरज निकलने जैसा था।पर दो दिन से विनोद ने सिगरेट पीना तो दूर छुआ तक नहीं था।
वह दो दिन से अपनी प्यारी मुहँ बोली बहन पल्लवी के विवाह की तैयारियों में व्यस्त था, बारात के आने का समय हो चला था।रिसेप्शन के लिए पार्लर से तैयार पल्लवी को लिवाने हेतु विनोद निकला ही था कि कार ड्राइव करते हुए पल्लवी का बचपन और उसकी शरारतें परत दर परत याद आती जा रही थी,वह मुस्करा रहा था।
पार्लर से निकल कर पल्लवी दुल्हन के वेश में तैयार विनोद का इंतज़ार कर रही थी।कार से निकल कर विनोद ने पल्लवी को नम आंखों से देखा तो मुस्कराना भूल आंसू नहीं रोक पाया ,पर अगले ही क्षण उसने पल्लवी को हंसाने के लिए चिढ़ाना शुरू कर दिया।कार से उतरकर पल्लवी विनोद से बोली,"भाई!आज आपसे एक प्रॉमिस चाहिए।"
विनोद रुआंसे गले से बोला "बोल ना क्या हुआ?"
'भैया प्रॉमिस करो आज के और अभी के बाद के बाद आप सिगरेट को हाथ नहीं लगाओगे।'
विनोद के आंसू छलछला आए और उसने स्वीकृति में गरदन हिला दी।
'पक्का प्रॉमिस?'
'हाँ,पक्का।अब खुश?'
और दोनों मुस्करा कर आगे बढ़ गए।


5- कायान्तरण

रोहित की बिगड़ती दिनचर्चा ने उसकी मां को परेशान कर दिया।जब से उसका बड़ा भाई अपना लैपटॉप घर छोड़कर गया है ,रोहित की कार्यशैली
 का कायान्तरण हो गया।माँ व्यग्र थी कि रोहित जो स्कूल से आकर अपनी पढ़ाई करता या दोस्तों से मिलता वह अब स्कूल बैग रखते ही बिना खाये -पिये लैपटॉप लेकर बैठता है न जाने कब सोता है,और स्कूल जाते समय तक नहीं छूटता ।घबराकर मां ने अमित को फ़ोन किया,'बेटा अमित जब से तुम अपना लैपटॉप छोड़कर गये हो ,रोहित की पढ़ाई तो जैसे बन्द ही हो गई।'
'मम्मी ! आप चिन्ता मत करो जब एक्जाम आयेंगे ,तब वह पढ़ लेगा।'
परन्तु मां की घबराहट जस की तस थी।बोर्ड की परीक्षा और रोहित की पढ़ाई से बेरुखी?
झुंझलाकर मां ने दो-तीन बार रोहित को समझाया भी,पर रोहित नहीं समझा।
आज जब मां उसे डाँटने लगी तो रोहित जो कभी मांं को जवाब नहीं देता था, मां की हर बात को काट रहा थाऔर मां को डाट भी दिया, मां के लिए स्थिति असहनीय थी,वह रुआंसा चेहरा, भरे गले से बाहर चली गई, रोहित का ध्यान पुनः लैपटॉप पर चल रही 'फेक फेसबुक आई डी 'पर गया जिस पर उसने स्टेटस डाला -
     कभी मां को ना देखुँ तो चैन नहीं आता,
     दिल ना जाने क्यूँ मां का नाम सोचते ही बहल जाता है,
     कभी मुस्करा दे तो लगता है ज़िन्दगी मिल गयी मुझको नयी,
      कभी दुःखी हो तो दिल मेरा भी दुःखी हो जाता है।
और अपनी  फेक फेसबुक आई डी की' फेक मदर ' से चेटिंग करने लगा।



                                 

टिप्पणियाँ

  1. हृदय स्पर्शी, बहोत सुन्दर

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  2. जीवन की सत्यता पर आधारित अत्यंत ही प्रेरणादायक |

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  3. प्रेरणास्पद बहुत खूब उन्नति करें

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  4. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  5. Beautifully penned..,......Nice expression of emotions......Keep on writing

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  6. वर्तमान परिस्थितियों को नज़र रखते हुए लिखी गयी उम्दा कृति

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  7. सटीक शब्दों में आज के परिवेश की व्याख्या

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  8. जीवन से झुड़ी हर छोटी बड़ी बातें कहानी के माध्यम से दर्शादी।
    बहुत सुन्दर लेख।

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