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प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध की कविताएँ


१ ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये



ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये ।
शिथिलता कहीं कोई आने न पाये ।।


बड़ी ही प्रबल हैं विषय वासनायें
सदा अपने चंगुल में मन को फसाँये ।
वही बच सके जो रहे साफ निश्छल
औ प्रभु की कृपा से गये जो बचाये ।।१।।


यहाँ मोहमाया ने सबको भुलाया
न कोई समय पर कभी काम आया ।
हरेक रास्ते में है धोखे हजारों
सदा कर्म अपने ही बस काम आये ।।२।।


है दुनियाँ पुरानी मगर अजनबी है
कभी कुछ है लेकिन अलग कुछ कभी है ।
बदलती रही सदा ये अपनी चालें
करेगी ये कल फिर कोई क्या बताये ?३।।


है बस अपना खुद का औ प्रभु का सहारा
न ऐसा कोई जो कभी न हो हारा।
थके हारे मन को मिली चेतना नई
तभी जब भी  भगवान ने पथ दिखाये ।।४।।


सदा ध्यान से शुध्दता मन ने पाई
यही शुध्दता ही है सच्ची कमाई ।
सदा ज्योति बन आये भगवान आगे
कि निष्पाप मन से गये जब बुलाये ।।५।।




२   नेताओं से...


देश सेवा परम उच्च आदर्श है
लोगों ने जानें तक दी हैं इसके लिये।
सोचिये आज क्या कर रहे आप हैं
यह उठापटक है सारी किसके लिये ?
देश सेवा में मन है तो उसके लिये
किसी कुर्सी या पद की जरूरत नहीं।
सैकड़ों काम दुनियॉं में सेवा के हैं
जो करें कुछ तो जीवन में फुरसत नहीं ।।
सिर्फ संकल्प के सिवा कुछ भी नहीं
सेवा करने को केवल लगन चाहिये।
अपने मन से भला पूछिये तो जरा
हैं ये कसरत-कवायत भला किसलिये ? ।।1।।

आज इस दल में है, कल किसी और में,
फिर किसी और में फिर किसी और में।
शांति मन की गंवा यों भटक क्यों रहे
भला हासिल क्या यों मन की झकझोर में ।।
है दलों में विचारों की जो भिन्नता
तो चुनावों में कुर्सी का कठजोड़ क्यो ?
देष भी है वहीं और जनता वहीं
लक्ष्य सेवा है तो दलबदल किसलिये ? ।।2।।

व्रत है सेवा का जो, धन का क्यों मोह तो,
क्यों ये सारे हवाले-घोटाले हुये ?
खेले जाते हैं क्यों, कुर्सी के वास्ते
पर्दे के पीछे आवागमन के जुये?
मोह से जागिये, स्वार्थ को त्यागिये
खुद को भी धोखा देना मुनासिब नहीं
जीतना सारी जनता का मन है उचित
अपनी छबि साफ सुथरी रखें इसलिए ।।3।।




३ चुनाव चक्कर 


राजनीति से उड़ गया , देश प्रेम का रंग
छिड़ी हुई है दलों में सिर्फ स्वार्थ की जंग

खेल कर रहे सभी दल चुप जनता के साथ
करते बस बातें बड़ी दे भाषण दिन रात

पिछले अनुभव से गया खो मन का विश्वास
बातों मे सच्चाई कम है ज्यादा बकवास

लोगों में क्यों रुचि रहे या श्रद्धा के भाव
वादे तो मीठे मधुर  मन में मगर दुराव

स्वार्थ नीति ही प्रमुख है राजनीति में आज
उदासीन है लोग सब बेबस सकल समाज

देखा है जब जब हुये जहां भी कहीं चुनाव
सभी दलों में आपसी बढ़ जाते टकराव

जन सेवा औ " समझ का कहीं न सही प्रचार
सुनने आते प्रलोभन औ" बीमार विचार

धोखे ही खाने मिले हर चुनाव के बाद
मत दाता का मत हुआ बार बार बेकार

दुनियां बस उनकी बसी जिनकी हो गई जीत
काम किये सबने सदा वादों के विपरीत

है चुनाव चक्कर अजब इसमें फंसकर लोग
पाल लिये करते सभी लेन देन का रोग

लोकतंत्र की भावना का दिखता विद्रूप
पावन होते तंत्र भी घिस पिट हुआ कुरूप

इसीलिये मिलती खबर जूता मारी खून
जिसकी लाठी साथ हो उसका ही कानून



४  दीप ऐसे जलायें इस दिवाली की रात


दीप ऐसे जलायें इस दिवाली की रात
कि जो देर तक, दूर तक उजाला करें
हो जहाँ भी, या कि जिस राह पर
पथिक को राह दिखला सहारा करें
जब अंधेरा हो घना घटायें घिरें
राह सूझे न मन में बढ़ें उलझने
देख सूनी डगर, डर लगे तन कंपे
तय न कर पाये मन क्या करें न करें
तब दे आशा जगा आत्म विश्वास फिर
उसके चरणो की गति को संवारा करें
दीप ऐसे जलायें इस दिवाली की रात
कि जो देर तक, दूर तक उजाला करें

हर घड़ी बढ़ रही हैं समस्यायें नई
अचानक बेवजह आज संसार में
हो समस्या खड़ी कब यहाँ कोई बड़ी
समझना है कठिन बड़ा व्यवहार में
दीप ऐसे हो जो दें सतत रोशनी
पथिक की भूल कोई न गवारा करें
दीप ऐसे जलायें इस दिवाली की रात
कि जो देर तक, दूर तक उजाला करें

रास्ते तो बहुत से नये बन गये
पर बड़े टेढ़े मेढ़े हैं,  सीधे नहीं
मंजिलों तक पहुंचने में हैं मुश्किलें
होती हारें भी हैं, सदा जीतें नहीँ
जूझते खुद अंधेरों से भी रात में
पथ दिखायें जो न हिम्मत हारा करें
दीप ऐसे जलायें इस दिवाली की रात
कि जो देर तक, दूर तक उजाला करें




५  आधार तम्हारा है

जीवन में जब कभी भी आई है आपदायें
संसार में सभी ने तुमको ही पुकारा है ।
भगवान इस जगत में सुख के सभी साथी हैं
दुख में सिवा तुम्हारे कोई न सहारा है ।।

जो देखते औ सुनते हैं रोज जमाने में
मुश्किल है समझ पाना कि बात क्या सही है ।
 हर डग पै समस्यायें है, उनसे जूझना है
हर दिन ले नई आशा, यहाँ जिन्दगी यही है ।।
समयों के थपेडो़ ने बहुतो को डराया है
मिलने को मिले लाखों, कोई काम न आया है
विश्वास पै तुम्हारे तुफान से जो खेले
उनको ही मिला आखिर सागर का किनारा है ।।१।।

हर रंग यहाँ मोहक, हर रूप  सलोना है
मीना बाजार जैसी दुनिया ये सुहानी है ।
सोना भी यहाँ माटी, माटी भी कभी सोना
सुन्दर वही मौसम का जिस पै चढ़ा पानी है ।।
कुछ भी समझ न पाया जो भी यहाँ आया है
हर एक मुसाफिर को माया ने लुभाया है
लुट गये हैं यहाँ लाखों, बाजार ही ऐसा है
बच पाया वही केवल जिसे तुमने उबारा है ।।२।।

भटके औ  थके हारे हैं द्वार पै तुम्हारे
करूणा निधान विनती सुन लीजिये हमारी ।
भक्तो की भावनाओं को जान लेने वाले
हे पापपुंजहारी हम हैं शरण तुम्हारी ।।
आकाश या धरती में जिस ओर नजर जाती
कण कण में तुम्हारी ही महिमा है नजर आती ।
हे शक्ति पुंज सबके तुम भाग्य विधाता हो
उलझन में फँसे मन को आधार तुम्हारा है ।।३।।

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