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एच के जोशी जी के उपन्यास 'मेरी यादों के झरोखों से' का अंश

...मधु फोन पर किशोर से बात करती रही वह भूल चुकी थी किवह आँचलपुर में किशोर के घर आई हुई है,समय इतनी तेजी से दौड़ता है मानो किसी से स्पर्द्धा हो,और सच तो बात यह है कि जहाँ प्रेम की चर्चा होती है वहाँ समय क्या कई शताब्दियों का समय भी कम है प्रेम की चर्चा करने में।यही स्तिथि हो गई थी मधु की,वह फोन पर बात करती जारही थी हर प्रश्न और उनके उत्तर स्वतःदोनो के ओर से बेरोक टोक आदान प्रदान होरहे थे,अतः कब समय गुजरा पता ही नही चला। दीदी घर नही चलोगी।चन्द्रा बोली।
चलेंगे जरा थोड़ी देर बात कर लेने दे।मधु ने चन्द्रा को जबाब दिया।
क्या  कह रही हो।दूसरी ओर से किशोर ने उससे पूछा।
जी...वह चन्द्रा साथ है उसे बोला था मैंने।मधु बोली।
चन्द्रा ड्राईंग रूम से वाहर आचुकी थी माजी के कहने पर मानिसि और चन्द्रा दोनो घरेलू काम मे ब्यस्त होगई आज वैसे भी दीपावली का त्यौहार मनाया जा रहा था चारो ओर खुशियों का वातावरण था।धीरे धीरे दिन छुप गया ,मांजी ने आकर ड्रायगरूम की लाइट आन की मधु ने झिझकते हुए फोन आहिस्ता से रख दिया।
ओ माई गॉड....।इतना समय बीत गया।मधु के मुहँ से स्वता निकला।
कोई बात नही बेटी।चलो अब फ्रेस हो लो मैं चाय की बोलती हूँ।माजी उसे प्यार से देखती हुई बोली।
मधु ने देखा दिन का उजाला अब रात्रि के सुरमाई अंधेरों में बदल रहा था।वह सकपकाती हुई ड्राइंगरूम में इधर उधर चक्कर लगा ने लगी।
भावी आप यह क्या कर रही हो।मानिसि मधु को देखती बोली।
चन्द्रा कहाँ है।
जी ....वह माँ जी के साथ दीबाली पूजा की तैयारी करा रही है।
ओह गॉड अब क्या होगा।वह अपने आप मे बुदबुदाई।
भावी जी आप कुछ परेशान हो।मानिसि बोली।
हमें घर पहुचना है।
लेकिन अब तो आपको कोई वाहन नहीं मिलेगा।वह बोली।
अगर हम घर नहीं पहुँचेंगे तो चन्द्रा के पिताजी वहुत परेशान होंगे।
वस ,इतनी सी बात के पीछे परेशान है आप,मैं अभी समाधान किये देती हुँ।मानिसि ने चुटकी बजाते हुए कहा।
वह कैसे।
मधु मानसी को देखने लगी।
वह ऐसे,आप चन्द्रा दीदी के पापाजी को हमारे टेलीफ़ोन से फोन कर दीजिए,उन्हें पता चल जाएगा।
ओह, मानिसि थैंक्यू,पर मैं किसतरह उन्हें समझा पाऊंगी।मधु असमंजस में बोली।
इस का भी समाधान है ,मानिसि बोली।
हमे भी तो बताओ।मधु आकुलता से बोली।
लेकिन हम आपको आइडिया निशुल्क नही देंगे।मानिसि हंसते हुई बोली।
ठीक है हम भी वायदा करते है कि तुम जो माँगलोगी वही देंगे।मधु बोली।
ठीक है ,पक्की बात।
ओ.के. डन।मधु ने बायदा किया।
अब समश्या का समाधान बोलो।
हमारी मांताजी फोन पर अंकल जी से बात करेंगी।
यू आर राइट।
तो लाओ मेरी शुल्क।
ओह नॉटी....मांगो अपनी शुल्क।
बस यही की आप मेरी जल्दी से जल्दी भाबी मा बनजाओ।मानिसि गम्भीरता से बोली।
मधु चुप हो गई वह कुछ भी न बोल सकी।
भाबी आप अपने बायदों से मुकर रहीं है।
मानिसि...मेरी प्यारी..अब मैं तुम्हें कैसे समझाऊं।मधु चिंता में भरी बोली।
दीदी आप ब्यर्थ में इधर उधर की बात सोचती हो,आप को मानिसि की बात मान लेनी चाहिये।चन्द्रा जो अभी अभी ड्राईंगरूम में आई थी बोली।
ओह, चन्द्रा तू नही समझेगी, मेरी मजबूरी......।
भाबी आप की ऐसी क्या मजबूरी है।
मैं बता नहीं सकती,और किसी को धौका भी नही दे सकती।
इसमें धोखा की बात कहाँ से आई।चन्द्रा और मानिसि एक साथ बोली।
चन्द्रा मेरी स्तिथि आज समाज मे क्या है और उनकी स्तिथि में कितना फासला है।
दीदी, एक बात पूंछू,आप सच बोलेंगी।चन्द्रा गम्भीरता से बोली।
आप ,मानिसि दीदी के भाई को प्यार नहीं करती,हो क्या।
चन्द्रा, यह तुम कह रही हो।मधु बिसमय से बोली।
  तो..... फिर यह आना कानी क्यो।                                                                         तुम सब जान ती हो,मैं एक परित्यक्ता ,समाज सेसजा पाई मजबूर जिसके पास अब कोई स्वयं का मान सम्मान नही,और कहाँ वह,समाज के क्षितिज पर चढ़ते हुये सूर्य,.....मेरा और उनका कोई मिलन की संभावनाएं नहीं। मधु एक स्वांस में कहती चली गई।
दीदी.....आप को तो अठारहबी सदी में जन्म लेना चाहिये था।चन्द्रा कठोर लहजे में बोली।
भावीजी आप मेरे भैया को प्यार नहीं करती क्या?
यह बात नहीं ,मानिसि ,इंसान इतना मजबूर होता है कि वह अपनी छोटी सी स्वार्थ सिद्धि के लिए ऐसे कदम नही उठा सकता।
तो फिर इतनी दूर चलकर आने का क्या मतलब था।
हर बात मतलब के लिये नही की जाती है,मैं स्वार्थी नही हुँ,हाँ उनको देखना चाहती थी दूर से चुप चाप अकेली अकेली,लेकिन यह भी तो नसीब नही हुआ मेरा....मधु के अश्रु उसके पलकोंसे ढलक कर कपोलो पर आचुके थे।
प्लीज दीदी सॉरी, आप .........।चन्द्रा उसके आंसू देख कर विचलित होकर बोली।
अरे लड़कियों इधर आकर रसोई में मेरा हाथ बटाओ।रसोई में से माजी की आबाज सुनाई पड़ी। तीनो ड्राईंगरूम से निकल कर मांजी के पास पहुँची।
माँ जी आप भाबीजी के अंकल जी को फोन कर कह दो की दोनो को यही रोक लिया है कल आँचलपुर भेज देंगे।मानिसि बोली।
माजी हम सबकुछ कार्य सम्भाल लेंगे,बस आप ड्राइंगरूम में बैठियेगा। मधु बोली।
नहीं बेटी तुम बैठो,मानिसि और चन्द्रा कार्य कराएंगी।माजी मधु से बोली। मजबूरन मधु किचिन से लौटी ,माजी ने चन्द्रा के पिताजी को फोन पर खबर कर दी थीऔर उन्होंने भी कोई एतराज नही किया ,मधु अब चिंतामुक्त थी,किशोर के घर उसे अपना घर जैसी अनुभूती हो रही थी,किन्तु उसका अंतःकरण यह स्वीकार नहीं कर रहा था कि वह किशोर की दुल्हन बने,उसके मन मे अनेक प्रश्न सिर उठा रहे थे,इसी विचारों में खोई वह किशोर के कमरे में पहुंची और उसके फोटो को हाथ मे लेकरदेखने लगी और फिर उस फोटो को चूमने लगी दीवानों की तरह अपने आपसे फोटो के साथ बात करने लगी।
आप.... कितने अच्छे है।
वताओ भी तो।
मेरे दिल से पूंछो।
नहीं तुम बोलो।
क्या....बोलूं।
यहीं की हम आपके लिये कितने बेचैन रहते है,और आप हो कि हमे भुलाबैठे हो।
नहीं पगली कभी कोई अपने आप को भुला पाया है।
तो फिर इतने समय से मिले क्यों नहीं।
मैं तुम से बिछड़ा ही कब था जो तुम से मिलता।
मझे तो नही मिले कभी।
मिल ता था जब तुम ज्यादा दुखी होती थी तो मैं ही तो तुम्हे ढाढस बंधाता था बोलो सच है या झूठ।
जी सही है।
तो क्यो कहती हो कि....।
सॉरी ....।
इट्स ओ,के,।
आपकी डायरी मैं क्या है।
पड़ कर देखो जो बात तुम पर गुजरी बह सब लिखी है।
कहते है कि किसी की डायरी नहीं पड़नी चाहिये।
सही है,किन्तु तुम मुझ से अलग हो कहाँ,
पर मैं अकेली....औरत ......और यह कठोर समाज...सच तो यह है मैं कमजोर पडजाती हुँ, आपके बिना।

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