1. समुद्र
-------
एकटक
निहार रही थी लहरों को
बन एक शून्य
शून्य तक निहार रही थी
दूर दिखती लहरें
अब पास दिख रही थी
लहरों के वेग देख
पहले डरी - डरी थी
पर अब खड़ी थी
सामना करने को तैयार
क्योंकि
अब पाँव जमा चुकी थी
रेत की ज़मीन पर
बेख़ौफ़
निर्विकार होकर ।
लहरें टकराकर
लौट रही थीं
पैरों तले ज़मीन भी
सरकती जा रही थी
हिल जा रही थी मैं
मगर मेरे इरादों को
गिरना मंजूर नहीं था ।
2. मृगनयनी
--------------
हां !
मृगनयनी थी वह
उसकी बड़ी - बड़ी आँखें
और
आंखों से बोलती वह
भाषा का तो पता नहीं
पर उन गहरी आंखों में
अकुलाते सपने
मुझे बहुत दिखे थे ।
हां !
मृगनयनी थी वह
मचलती थीं उसकी
चंचल पुतलियां
और
पुतलियों में थी
एक अजीब सी चमक
जो उसे
औरों से अलग बता रहे थे ।
हां !
मृगनयनी थी वह
उसके श्यामल चेहरे पर
आंखों के सामने गिरते
काले ,घुंघराले और उलझे केश
मेरे न चाहते हुए भी
मुझे और कुछ लफंगों को
उलझाते ही जा रहे थे ।
हां !
उसी मृगनयनी को
जिसके कांधे पर
लटक रहा था मटमैला झोला
और झोले से हुलक रहे थे
रास्ते से चुने हुए कचरे
जो उसके लिए
रोटी का इंतज़ाम
कर रहे थे ।
हां !
उसी मृगनयनी को देख
बेबस खड़ा मैं
उसकी आँखों में डूबता गया
पर
अपनी कायर आंखों से
चाह कर भी
उसके आगे कुछ न देख सका
और धीरे - धीरे
वह मृगनयनी
ओझल होते गई
और खो गई
मनुष्य के जंगल में
अपने अस्तित्व के साथ
एक कस्तूरी मृग की तरह ।
3. अकुलाहट
---------------
अकुलाती है उंगलियां
मनोभाव उकेरने को
नाचता है मन
आकृतियों में रंग भरने को
तरस जाती हैं आंखें
उन रंगों में
अपना आशियाना देखने को
पर
दौड़ा जा रहा वक़्त
भाग रही ज़िन्दगी
और जब
अतीत के कुछ पन्ने
पलट कर देखती हूँ
तब इस भाग - दौड़ में
टूट रहीं हैं आकृतियां
कई चटख रंग
फीके पड़ रहे हैं
कहीं फैल गया है स्याह रंग
कई रंग ढूंढ रहे हैं मुझे
और मैं तो
खुद हर पन्नों में ढूंढ रही हूँ
अपनी फिसलती ज़िन्दगी
इस अंधी दौड़ में
अब मुझे नहीं दौड़ना
कहीं तो विराम चाहिए
थोड़ा सुकून
थोड़ी सी ख़ुशी
जो जीने के लिए काफी है ।
4. नानी-घर
--------------
माँ !
चलो न नानी घर
नाना - नानी नहीं
तो क्या हुआ
दिराखा पर रखी ढिबरी तो होगी
मंद रौशनी से
कई यादें रौशन होंगी
कोठरी के दरवाजे पर लगा होगा
कुंडी और ताला।
चाभी नहीं तो क्या हुआ
कहीं तो एक
झरोखा होगा
जहां से दिखेंगी
कुछ बोलती
टकटकी लगाती
धूमिल तस्वीरें ।
दालान में पड़ी होंगी
झगड़े सुलझाती
कुछ काठ की कुर्सियां
और अँगना में फैली होंगी
कद्दू , नेनुआ और कोहड़ा की
सुखी लत्तरें और
बाट जोहती होंगी
जंग लगी
लोहे की जालियां ।
सच !
चलो न माँ
कहीं किसी कोने में
बैठी होगी
नाना के पनबट्टे की खुशबू
और
नानी की यादें
साथ ही
कोठरी में गूंजती होगी
राजा - रानी के किस्से ।
चलो न माँ !
तुम्हारे घुटनों का दर्द
शायद छू मंतर हो जाए
तुम दौड़ने लगो
अपने बचपन में
और
खिलखिला उठे नाना - नानी
क्योंकि
मैंने सपनों में
नानी को परेशान देखा है
तुम्हारे दर्द को लेकर ।
5. मौन को मुखर होने दो
-----------------------------
मुझे गंवारा नहीं
तुम्हारा सागर सा शांत हो जाना
तुम्हारे अंदर की गहराई
मैं माप नहीं सकती
तुम्हारे छिपे आवेग को
मैं सह नहीं सकती
तुम्हारा पत्थर सा जड़ हो जाना
मुझे नहीं भाता
वक़्त के थपेड़ों से उभरे खुरदुरापन
मैं देख नहीं पाती
इसलिए
मौन को मुखर होने दो
यह वादा मुझे आज लेने दो
सहनशीलता की दहलीज को
एक बार खुद से लांघ जाने दो
अंदर का शोर....
दबी हुई चीखें.....
अब आदमी नहीं सुनता
और न सुनता कोई देवता
कुछ शिकायतें करो....
कुछ मिन्नतें करो...
खुद से बातें करो...
खुल कर रोया करो...
और एक बार
बस एक बार
मौन को मुखर होने दो !!
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एकटक
निहार रही थी लहरों को
बन एक शून्य
शून्य तक निहार रही थी
दूर दिखती लहरें
अब पास दिख रही थी
लहरों के वेग देख
पहले डरी - डरी थी
पर अब खड़ी थी
सामना करने को तैयार
क्योंकि
अब पाँव जमा चुकी थी
रेत की ज़मीन पर
बेख़ौफ़
निर्विकार होकर ।
लहरें टकराकर
लौट रही थीं
पैरों तले ज़मीन भी
सरकती जा रही थी
हिल जा रही थी मैं
मगर मेरे इरादों को
गिरना मंजूर नहीं था ।
2. मृगनयनी
--------------
हां !
मृगनयनी थी वह
उसकी बड़ी - बड़ी आँखें
और
आंखों से बोलती वह
भाषा का तो पता नहीं
पर उन गहरी आंखों में
अकुलाते सपने
मुझे बहुत दिखे थे ।
हां !
मृगनयनी थी वह
मचलती थीं उसकी
चंचल पुतलियां
और
पुतलियों में थी
एक अजीब सी चमक
जो उसे
औरों से अलग बता रहे थे ।
हां !
मृगनयनी थी वह
उसके श्यामल चेहरे पर
आंखों के सामने गिरते
काले ,घुंघराले और उलझे केश
मेरे न चाहते हुए भी
मुझे और कुछ लफंगों को
उलझाते ही जा रहे थे ।
हां !
उसी मृगनयनी को
जिसके कांधे पर
लटक रहा था मटमैला झोला
और झोले से हुलक रहे थे
रास्ते से चुने हुए कचरे
जो उसके लिए
रोटी का इंतज़ाम
कर रहे थे ।
हां !
उसी मृगनयनी को देख
बेबस खड़ा मैं
उसकी आँखों में डूबता गया
पर
अपनी कायर आंखों से
चाह कर भी
उसके आगे कुछ न देख सका
और धीरे - धीरे
वह मृगनयनी
ओझल होते गई
और खो गई
मनुष्य के जंगल में
अपने अस्तित्व के साथ
एक कस्तूरी मृग की तरह ।
3. अकुलाहट
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अकुलाती है उंगलियां
मनोभाव उकेरने को
नाचता है मन
आकृतियों में रंग भरने को
तरस जाती हैं आंखें
उन रंगों में
अपना आशियाना देखने को
पर
दौड़ा जा रहा वक़्त
भाग रही ज़िन्दगी
और जब
अतीत के कुछ पन्ने
पलट कर देखती हूँ
तब इस भाग - दौड़ में
टूट रहीं हैं आकृतियां
कई चटख रंग
फीके पड़ रहे हैं
कहीं फैल गया है स्याह रंग
कई रंग ढूंढ रहे हैं मुझे
और मैं तो
खुद हर पन्नों में ढूंढ रही हूँ
अपनी फिसलती ज़िन्दगी
इस अंधी दौड़ में
अब मुझे नहीं दौड़ना
कहीं तो विराम चाहिए
थोड़ा सुकून
थोड़ी सी ख़ुशी
जो जीने के लिए काफी है ।
4. नानी-घर
--------------
माँ !
चलो न नानी घर
नाना - नानी नहीं
तो क्या हुआ
दिराखा पर रखी ढिबरी तो होगी
मंद रौशनी से
कई यादें रौशन होंगी
कोठरी के दरवाजे पर लगा होगा
कुंडी और ताला।
चाभी नहीं तो क्या हुआ
कहीं तो एक
झरोखा होगा
जहां से दिखेंगी
कुछ बोलती
टकटकी लगाती
धूमिल तस्वीरें ।
दालान में पड़ी होंगी
झगड़े सुलझाती
कुछ काठ की कुर्सियां
और अँगना में फैली होंगी
कद्दू , नेनुआ और कोहड़ा की
सुखी लत्तरें और
बाट जोहती होंगी
जंग लगी
लोहे की जालियां ।
सच !
चलो न माँ
कहीं किसी कोने में
बैठी होगी
नाना के पनबट्टे की खुशबू
और
नानी की यादें
साथ ही
कोठरी में गूंजती होगी
राजा - रानी के किस्से ।
चलो न माँ !
तुम्हारे घुटनों का दर्द
शायद छू मंतर हो जाए
तुम दौड़ने लगो
अपने बचपन में
और
खिलखिला उठे नाना - नानी
क्योंकि
मैंने सपनों में
नानी को परेशान देखा है
तुम्हारे दर्द को लेकर ।
5. मौन को मुखर होने दो
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मुझे गंवारा नहीं
तुम्हारा सागर सा शांत हो जाना
तुम्हारे अंदर की गहराई
मैं माप नहीं सकती
तुम्हारे छिपे आवेग को
मैं सह नहीं सकती
तुम्हारा पत्थर सा जड़ हो जाना
मुझे नहीं भाता
वक़्त के थपेड़ों से उभरे खुरदुरापन
मैं देख नहीं पाती
इसलिए
मौन को मुखर होने दो
यह वादा मुझे आज लेने दो
सहनशीलता की दहलीज को
एक बार खुद से लांघ जाने दो
अंदर का शोर....
दबी हुई चीखें.....
अब आदमी नहीं सुनता
और न सुनता कोई देवता
कुछ शिकायतें करो....
कुछ मिन्नतें करो...
खुद से बातें करो...
खुल कर रोया करो...
और एक बार
बस एक बार
मौन को मुखर होने दो !!
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