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रेखा तोमर की कहानी

ऑक्सीजन

रात की बची सब्जी भरकर परांठा बनाया, रोल बनाकर मुँह में जल्दी जल्दी निगलने लगी, पापा की बात याद आई"बेटा खाना चबा चबा कर खाया करो, जल्दी पचता है"
लेकिन अब जिंदगी इतनी जल्दबाजी में है कि खाना पचाने की फुर्सत किसे है?
देखा जाए तो इस समय खाने से ज्यादा जरूरत तो दवाइयों की पड़ती है, वो बिस्तर पर लेटे हुए मुझे ही देख रहे थे
"फिर कहीं खो गई"?
"उम्मम, नही ऐसे ही"
"उमा, तुम पर बोझ बनकर रह गया हूँ"
आशीष के मुँह से निकली यही बात मेरे हृदय में शूल सी चुभती है, आंसुओ की धार रोकते रोकते भी  बह निकली।
उनका हाथ कस कर दोनो हाथों के बीच थामा और बोली"मेरी लाइफ हो तुम, ये सब बोलकर मेरे प्यार का मज़ाक क्यो उड़ाते हो?तुमने पूरे समाज से लड़ कर मुझसे शादी की..मैं तुम्हारे लिए इन हालातों से नही लड़ सकती"?
"बिल्कुल लड़ सकती हो, मेरी शेरनी हो तुम"
उनके माथे पर चुम्बन दे मैं निकल पड़ी अपनी उस सस्ती सी जॉब पर जहाँ लोगो के ईमान उससे भी सस्ते है
लव मैरिज की है तो परिवार सहायता के लिए साफ मना कर चुका, इनके परिवार के अनुसार मुझसे शादी की इसलिए ये बीमार है और मेरे परिवार के अनुसार उनका दिल दुखाने का नतीजा भुगत रही हूँ मैं
ज्यादा पढ़ी लिखी नही हूं तो जहाँ जो जॉब मिली कर ली, आशीष का इलाज और दवाइयों के लिए रेगुलर इनकम बहुत जरूरी है।
बहुत दिन से प्रमोशन अटका है, संदीप के अनुसार मुझे बॉस को खुश करना होगा, पर मैं काफी कुछ कर चुकी उन्हें खुश करने के लिए, बहुत मेहनत, बहुत ज्यादा मेहनत..
इस उम्मीद में शायद मेरी मेहनत वो काम कर जाए जो काम वो मुझसे चाहते है।
सेविंग खत्म होती जा रही है, दवाइयां लेते समय हिसाब के पर्चे पर चलती  केमिस्ट की कलम का एक एक शब्द दिल की धड़कन बढ़ा देता है।
क्या हुआ अगर पर्स में उतने पैसे ना निकले तो?
ये प्रमोशन मेरी आखिरी उम्मीद है, बहुत से मेडिकल बेनिफिट जो जुड़े है इससे..
ऑटो ऑफिस के ठीक सामने रुका और मुझे वो वहीं खड़ा दिखा अचल, अटल, अपनी भव्यता के साथ..इसके हर एक अंग के औषधीय उपयोग के कारण सदैव किसी ना किसी को इस पर आघात करते देखा, कभी सर्वेंट क्वार्टर के बच्चों का झूला बना ये, कभी सवारी का इंतजार करते लोगो का हमसाया..
इसलिए इस बरगद के पेड़ से मेरा अलग ही लगाव है,  इसे देख हालातो से लड़ने की शक्ति मिलती है, इतना फैला हुआ, इतना विशाल पूरा शहर इसके सामने बौना नजर आता है।
सरकार ने इसे काटने की अनुमति नही दी,इसलिए इस पॉल्युशन भरे वातावरण मे अडिगता से खड़ा ये पेड़ इस कीचड़ भरे ऑफिस में मेरी मौजूदगी दिखाता है।
"उमा जी बॉस ने केबिन में बुलाया है" पियोन ने रहस्यभरी मुस्कान के साथ कहा
"May I come in sir"?
"आओ उमा तुम्हे पूछ कर आने की जरूरत नही"
वहीं बातें जिनसे मुझे घिन्न आती है, मैं बहुत धैर्यपूर्वक चेयर पर बैठी वो ठीक मेरी चेयर के सामने
"जी सर"?
"सीधी बात कहूंगा,कल मेरी मिसिज़ टूर पर जा रही है तो शाम 4 to 6 फिक्स कर लेते है"
"किस के लिए फिक्स सर"?
"तुम्हारे पति के इलाज के लिए, तुम्हारे होमलोन के लिए..समझ गई"
इसके बाद बॉस क्या बोलता रहा पता नही, पर मुझे तो सिर्फ आशीष दिख रहे थे..लाचार असहाय
ऑफिस से बाहर निकली पेड़ के चारो तरफ लोग नापने में बिजी थे।
"क्या हो रहा है ये"?
"बहुत बड़ा फ्लाईओवर का प्रोजेक्ट है, 4 लेन सड़क भी बनेगी,काटने की तैयारी चल रही है" कलीग ने बताया
इस पेड़ का और मेरा भाग्य यही है शायद,
जैसे तैसे घर पहुँची घर का सारा काम पड़ा था, आशीष कपड़े बदल बिस्तर पर लेटे थे
मुझे देखकर उठने को कोशिश करते हुए मुस्कुराए..मैंने मुस्कुराने की बहुत कोशिश की पर होठो को जबरदस्ती भी नही हिला पाई।
"दवाई ली"
"ह..हाँ ले ली"
आशीष का झूठ मैं हमेशा पकड़ लेती हूं, आज भी पकड़ लिया
दवाइयां खत्म थी साथ ही खत्म हो गई मेरा आत्मसम्मान भी..
मैंने बॉस को फोन किया"सर मैं शाम को आ जाऊंगी"
फोन रखने के साथ ही मैं दहाड़े मार मार कर रोने लगी, मेरा सब कुछ मुझसे छीनने जा रहा था वो भी उसके लिए जो मेरा सब कुछ था
आशीष मेरी आवाज सुन धीरे धीरे कमरे में आ गए
"क्या हुआ उमा"?
"कुछ नही, घरवालों की याद आ गई ,आज होते तो"
"एक बात बोलूं उमा"
"हम्म"
"तुम मेरी सब कुछ हो, चाहता हूँ जब तक जिऊँ तुम्हे हँसते हुए देखूं.. तुम्हे रोता हुआ देखता हूं तो एक मौत उसी समय हो जाती है मेरी..मुझसे सच्चा प्यार करती हो तो कभी दुखी मत होना.. ना मेरे लिए ना मेरी दवाइयों के लिए..बस मरते दम तक मेरी उमा बनकर रहो सिर्फ मेरी.."
"मैं तुम्हारे साथ 2 महीने रहूं या दो साल पर जव तक रहूं तुम्हे घुटते हुए ना देखूँ, यही मेरी अंतिम इच्छा है उमा..मेरे इलाज के लिए ऐसा कुछ करने की मत सोचना जिसकी इजाजत तुम्हारा आत्मसम्मान तुम्हें ना दे"
"कभी नही कभी नही.."इतना कहते कहते मैं आशीष क़े गले से लिपट गई
"एक बात बोलूं, तुम मेरी ऑक्सीजन हो, मेरी संजीवनी बूटी..तुम दुखी होकर मेरी जीवनदायिनी शक्ति को कमज़ोर कर देती हो..वादा करो के कभी ऐसा नही करोगी"
"कभी नही करूँगी"
सुबह ऑटो से उतरते ही देखा लोग पेड़ को काटने की तैयारी में लगे थे मुझे अचानक जाने क्या हुआ मैं दौड़ती हुई गई और पेड़ से लिपट कर जोर जोर से बिलखने लगी"प्लीज् इसे मत काटो प्लीज् इसे मत काटो"
लोग पागल, सनकी जाने क्या क्या बोल रहे थे, पर मैं अपनी ऑक्सीजन से लिपटी थी, उस विशाल व्यक्तित्व से जो मुझे जीने की प्रेरणा देता था।
आज दो साल हो गए ना आशिष है ना वो पेड़..पर मैं अपने आत्मसम्मान के साथ जीवित हूँ और प्रसन्न भी क्योंकि जानती हूं आशीष भी ऊपर खुश होंगे उनकी ऑक्सीजन दूषित जो नही हुई।
पर उस पेड़ के जाने से वहाँ का वातावरण प्रदूषित हो चुका है, काश तुम भी खुद को बचा पाते तो बच जाती ये मानव जाति भी...

टिप्पणियाँ

  1. Heart touching story...keep writing taruna ma'am...we love you ❤

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  2. Wonderful work dearest mam
    Great regards to you
    Keep doing such great works
    We are honoured to have our hindi teacher as you..
    Kritika

    जवाब देंहटाएं
  3. Very Beautiful story ma'am....
    Awesome...
    Blessed to have u as our hindi teacher......
    So nice and amazing...👏👏👏👏🖒🖒🖒🖒🖒🖒👍👍👍👍👍

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  4. बेहतरीन रचना.. आपकी हर रचना एक से बढ़कर एक होती है..👌👌

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