इन दिनों एक पोस्ट देखी जिसमें आदरणीय बलराम अग्रवाल जी ने अपने संपादन में प्रकाशित लघुकथा संकलन 'सपने बुनते हुए' का उल्लेख करते हुए इस बात पर असंतोष जताया कि उसमें संकलित लघुकथाकारों ने उस पुस्तक के प्रचार एवं प्रसार हेतु कोई भूमिका नहीं निभाई। उनका कहना था कि लघुकथाकारों ने ना तो पुस्तक क्रय की और ना ही उस पुस्तक पर समीक्षा लिखकर उसके प्रचार-प्रसार में योगदान दिया। हालांकि उनका यह असंतोष एक दृष्टि से सही भी है किंतु इसके अन्य पक्षों एवं कारणों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि मैं लघुकथा के अपने शुरुआती दिनों की बात करूं तो उन दिनों मुश्किल से दो या तीन ग्रुप ही थे फेसबुक पर जिनमें विशेष रुप से लघुकथा संबंधी गतिविधियां ही की जाती थी किंतु जैसे जैसे लघुकथाकार बढ़ते चले गए व्यापारी एवं दुकानदारों का भी इसमें प्रवेश होता चला गया और उन्होंने अपने निजी स्वार्थ एवं लाभ के लिए पहले तो लघुकथाकारों को प्रलोभन देकर अपनी ओर आकर्षित किया और फिर उनसे सहयोग राशि लेकर उनकी लघुकथाओं को पुस्तक का रूप दिया। सहयोग राशि लेकर बनाए गए लघुकथा संकलन का स्तर कैसा होगा इसका अनुमान आप भी लगा सकते हैं। ऐसे लघुकथा संकलन का एक ही गंतव्य होता है - कबाड़
उन दिनों लघुकथा के साझा संकलन की बाढ़ सी आ गई थी। सभी कीर्तिमान बनाने में लगे हुए थे। कोई लघुकथा संकलन का अर्धशतक पूरा करने में लगा था तो कोई शतक। किसी को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था कि उस अर्धशतक अथवा शतक में कितनी लघुकथाएं थी अर्थात लघुकथाएं थी भी या नहीं और कितनी लघुकथाओं में पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने का सामर्थ्य था। अति तो तब हुई जब कुछ तथाकथित समीक्षकों ने अपना नाम इतिहास में दर्ज कराने के मोह में ऐसी लघुकथाओं पर भी एक पक्षीय टिप्पणी की जिनके लघुकथा होने पर ही प्रश्नचिह्न था। जैसे-जैसे लघुकथाकार बढ़ते गए वैसे-वैसे दुकानदारों अथवा व्यापारियों की संख्या भी बढ़ती चली गई। ये वही लोग थे जिन्होंने लघुकथा की सेवा के नाम पर ना केवल अपना गुरुत्व स्थापित किया बल्कि लघुकथा को उसके लघुतम अर्थात निम्नतम स्तर तक पहुंचा दिया।
परिणाम यह हुआ कि लघुकथा संकलन के नाम पर ऐसी लघुकथाएं पाठकों के लिए उपलब्ध कराई गई जिन्हें बर्दाश्त करना उनके सामर्थ्य से बाहर था और इस तरह धीरे-धीरे पाठकों का लघुकथा संकलन से मोहभंग होता चला गया। अब ऐसे में माहौल में चुनिंदा अच्छे एवं स्तरीय लघुकथा संकलन भी पाठकों में जान नहीं फूँक सके।
आज भी जब कोई लघुकथा संकलन प्रकाशित होता है तो एक पाठक के रूप में सर्वप्रथम मन में यही प्रश्न उठता है कि उस संकलन में कितनी लघुकथाएं पढ़ने लायक होंगी या फिर होंगी भी या नहीं?
इन दुकानदारों ने लघुकथा संकलन के रूप में ना केवल कचरा जमा किया बल्कि लोगों से जबरदस्ती लघुकथाएं लिखवाकर तथाकथित लघुकथाकारों के नाम पर भीड़ भी जमा की। लोगों में 'मैं भी लघुकथाकार', 'मैं भी लघुकथाकार' की होड़ से हो गई थी।
हालांकि इसमें लघुकथाकारों की भी भूमिका कम नहीं है उन्होंने भी जल्द प्रकाशित होने के लोभ में इन दुकानदारों का खूब सहयोग किया।
इन सबके बावजूद सुखद बात यह है कि कुछ लोगों ने इस दिशा में ईमानदारी से प्रयास भी किए जिसका परिणाम यह हुआ कि कुछ अच्छे लघुकथा संकलन भी पाठकों के लिए उपलब्ध हो पाए। 'सपने बुनते हुए' एक ऐसा ही ईमानदार प्रयास है।
यक्ष प्रश्न -
1. किंतु समस्या यह है कि यदि एक पाठक रूप में आपको यह बताया जाए कि बाज़ार में सौ लघुकथा संकलन में दो बेहतरीन लघुकथा संकलन है तो क्या आप इन सौ लघुकथा संकलन को खंगालने अर्थात उन्हें खरीदने की हिम्मत जुटा पाएंगे।
2. यदि एक लघुकथाकार के रूप में आपको यह कहा जाए कि इधर-उधर के व्यर्थ के संकलन में छपने से बेहतर है, आपको अच्छे संकलन का इंतजार करना चाहिए, विशेष रूप से उन लघुकथा संकलन में जिन्हें कम-से-कम 40% इमानदारी से अवश्य बनाया गया हो। इमानदारी से बताइएगा कि क्या वाकई में आपके पास इतना धैर्य है कि आप ऐसे संकलन में प्रकाशित होने तक स्वयं को रोककर रख सकें। हालांकि इसका अप्रत्यक्ष लाभ आपको ही है क्योंकि इस स्थिति में आप अपनी लघुकथाओं का स्तर बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयास करते रहेंगे।
सुझाव -
ईमानदार प्रयासों को बढ़ाने की जरूरत है ताकि पाठक के लिए बेहतर संकलन अधिक संख्या में उपलब्ध हो सकें। किंतु इतना ही पर्याप्त नहीं है। स्तरहीन संकलन की वृहत स्तर पर आलोचना भी होनी चाहिए ताकि संकलन निकालने से पूर्व प्रकाशक हज़ार बार जरूर सोचे।
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