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पुस्तक प्रकाशन से पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें

अधिकतर लेखक मित्र जब भी अपनी पुस्तक प्रकाशन की योजना बनाते हैं तो उसमें पुस्तक के प्रिंट वर्जन पर विशेष ध्यान देते हैं। आज भी उनका यही मानना है कि ईबुक की तुलना में प्रिंट वर्जन अधिक प्रभावी होता है।

हालांकि मैंने भी अपनी कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं और मेरा अनुभव यह कहता है कि पुस्तक प्रकाशन से पूर्व लेखक को अपने उद्देश्य को समझना होगा। उदाहरण के लिए यदि मैं अपनी बात करूं तो जब मैंने पुस्तक प्रकाशन का निर्णय लिया तो मेरा प्रमुख उद्देश्य यही था कि मेरा लेखन अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचे बल्कि ऐसे पाठको तक पहुंचे जो पुस्तक पढ़ने में वास्तव में रुचि लेते हैं या फिर जो पुस्तकों के माध्यम से नए नए विषय तलाशते रहते हैं। प्रिंट के माध्यम से मेरे इस उद्देश्य की पूर्ति संभव नहीं थी इसीलिए मैंने ईबुक को प्राथमिकता दी। ईबुक को प्राथमिकता देने के प्रमुख कारण थे:

1. ईबुक की पहुंच अधिक से अधिक लोगों तक थी। ईबुक के माध्यम से मेरा लेखन दुनिया के कोने-कोने में पहुंच सकता था।
2. यह हमेशा के लिए स्टॉक में रहती अर्थात मुझे बार-बार इसकी प्रतियां छपवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती
3. आवश्यकता पड़ने पर इसमें कभी भी संशोधन किया जा सकता है। 
4. एक महत्वपूर्ण लाभ यह है कि ईबुक के पाठक उसे पढ़ने के पश्चात अपनी प्रतिक्रियाओं से भी अवगत कराते हैं। ऐसे में आपको अपनी पुस्तक की यात्रा का भी बोध निरंतर होता रहेगा। 
5. रही बात लाभ की तो एक बार यदि आप की पुस्तक अर्थात आपका लेखन पाठकों को पसंद आ जाता है तो पाठक स्वयं आपके लेखन का बेसब्री से इंतजार करेंगे और यह तो आप भी भली-भांति जानते हैं कि बाजार में आप की मांग बढ़ने पर लाभ स्वतः मिलने लगेगा।
6. ईबुक में आरंभ के कुछ पेज सैंपल के रूप में पाठकों के लिए निशुल्क उपलब्ध होते हैं जिसका अभिप्राय यह है कि पाठक सैंपल पढ़ने के पश्चात ही उस पुस्तक को खरीदने अथवा डाउनलोड करने का निर्णय लेता है। सैंपल साइज लगभग 20% रहता है अर्थात यदि आपकी पुस्तक में कुल पृष्ठ 100 हैं तो सैंपल के रूप में 20 पेज पाठकों के लिए निशुल्क उपलब्ध होंगे जबकि प्रिंट में पाठकों के लिए यह सुविधा नहीं होती।
7. प्रिंट के मुकाबले ईबुक काफी सस्ता भी है।
8. ईबुक का मूल्य भी आप नियंत्रित कर सकते हैं अर्थात आप जब चाहे उसे निशुल्क कर सकते हैं और जब चाहे उसका मूल्य घटा-बढ़ा सकते हैं।

मैं यह नहीं कहता कि प्रिंट वर्जन प्रकाशित नहीं करवाना चाहिए। प्रिंट का प्रकाशन तब करवाइए जब आपकी ईबुक पाठकों को प्रभावित करने में सफल रहे। तब तक प्रिंट की उतनी ही प्रतियां प्रकाशित करवाएं जितनी आपको पुरस्कारों इत्यादि के लिए भेजने हेतु आवश्यक हों।

मैंने अनुभव किया है कि बहुत से लेखक मित्र सफलता जल्द से जल्द हासिल करने के लिए जोड़-तोड़ का सहारा लेते हैं। उनकी इसी प्रवृत्ति का लाभ उठाते हुए विभिन्न प्रकाशन आकर्षक एवं लुभावनी योजनाओं का जाल बुनते हैं जिसमें फंसने के पश्चात लेखक आर्थिक हानि तो उठाते ही हैं साथ ही अपने उद्देश्य में भी सफल नहीं हो पाते अर्थात अपना लेखन वास्तविक पाठक तक नहीं पहुंचा पाते। हालांकि यह संभव है कि इस जोड़-तोड़ के द्वारा तत्काल तथाकथित सफलता हासिल हो जाए किंतु ऐसी सफलता अधिक समय तक अपने अस्तित्व को नहीं बचा पाती।

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