सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

लघुकथा मंजूषा 5 - चयनित लघुकथाकारों की सूची

वर्जिन साहित्यपीठ सभी लेखक मित्रों का आभारी है कि उन्होंने लघुकथा मंजूषा 5 हेतु अपनी लघुकथाएँ भेजकर इस आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

सीमाओं के चलते सभी लघुकथाएं इसमें शामिल नहीं हो पाई हैं, जिसका हमें खेद है। चयनित लघुकथाकारों की सूची इस प्रकार है:

उपेंद्र सिंह
भारती कुमारी
डॉ प्रदीप उपाध्याय
अर्चना राय
लक्ष्मी मित्तल
नीलम पारीक
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
सुषमा सिंह चुंडावत
राजकुमार कान्दू
अंजना छलोत्रे
मीना सूद
मृणाल आशुतोष
ममता शुक्ला
हरदीप सबरवाल
कनक हरलालका
डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी
विजयानन्द विजय
सुषमा तिवारी
सतीश राठी
ललित मिश्र
मंजू शर्मा

अन्य अपडेट हेतु ब्लॉग को सब्सक्राइब अवश्य कीजिए।

किसी भी जिज्ञासा अथवा शंका समाधान हेतु संपर्क कीजिए

वर्जिन साहित्यपीठ
9971275250

टिप्पणियाँ

चर्चित रचनाएँ

संतोष श्रीवास्तव की कविताएँ

आंदोलिता हवाएँ -------------------- ये आंदोलिता हवाएँ टिकने न देंगी मोम पर जलती, थरथराती लौ अंधेरे से निपटने की तमाम कोशिशें नाकाम करने पर उतारू इन हवाओं का नहीं कोई ठिकाना गुज़रती जा रही हैं कुसुम दल से, डालियों से, झील के विस्तार को झकझोरती मोम के आगोश में लौ का बुझता, मरता अस्तित्व पर यह उतना आसान भी न था सम्हाल रखा है एक आतुर प्रण लिए तरल मोम ने बूँद सी लौ को लड़ने की पूरी ताकत से एक आंदोलन हवा के खिलाफ वहाँ भी तो था ****** आर्त्त पुकार ++++++++ मैंने अरमानों के कुछ बीज अपनी मुट्ठी में दबा रखे हैं और आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूं मौसम की दस्तक का चारों ओर नि:शब्द सन्नाटा है पानी की एक बूंद तक नहीं आषाढ़, सावन,भादो भरोसा दिलाते रहे कहीं धुनके हुए कहीं सिलेटी बादलों से हवा संग छितराते रहे पर बरसे नहीं सूखी, पपड़ाई धरती करती रही प्रतीक्षा अपने प्रियतम बादलों के बरसने का कोख में दबे बीजों के झुलस जाने की आशंका धरती का कलेजा कर रही चूर चूर आता तो रहा है अब तक मौसम सिलसिलेवार इस बार क्या हुआ मौसम की आवाजाही को बूढ़ी धरती ...

वर्जिन

ललित कुमार मिश्र मैं वर्जिन हूँ विवाह के इतने वर्षों के पश्चात् भी मैं वर्जिन हूँ संतानों की उत्पत्ति के बाद भी। वो जो तथाकथित प्रेम था वो तो मिलन था भौतिक गुणों का और यह जो विवाह है यह मिलन था दो शरीरों का मैं आज भी वर्जिन हूँ अनछुई स्पर्शरहित। मैं मात्र भौतिक गुण नहीं मैं मात्र शरीर भी नहीं मैं वो हूँ जो पिता के आदर्शों के वस्त्र में छिपी रही मैं वो हूँ जो माँ के ख्वाबों के पंख लगाये उड़ती रही मैं वो हूँ जो पति की जरूरतों में उलझी रही मैं वो भी हूँ जो बच्चों की खुशियों के पीछे दौड़ती रही। मैं अब वर्जिन नहीं रहना चाहती मैं छूना चाहती हूँ खुद को।