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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

जनकवि/जनलेखक नागार्जुन प्रतियोगिता (2020)

वर्जिन साहित्यपीठ जनकवि/जनलेखक प्रतियोगिता 2020 हेतु कविता/लघुकथा/कहानी/निबंध/लेख आमंत्रित करता है 1. प्रथम पुरस्कार: 3100 रुपये 2. अन्य पुरस्कार: टॉप 10 में पहुँचने वाले अन्य सभी  लेखकों की एक पुस्तक पुरस्कारस्वरूप प्रकाशित की जाएगी। उन्हें 1 लेखकीय प्रति भी प्रदान की जाएगी। निर्णायक मंडल: गूगल प्ले स्टोर के पाठक प्रवेश प्रक्रिया: आपको न्यूनतम 21 कविताएँ/लघुकथाएँ अथवा 11 कहानियाँ अथवा 15 लेख/निबंध परिचय और फोटो के साथ virginsahityapeeth@gmail.com पर भेजना है। भेजने से पूर्व अशुद्धियाँ जांच लें और रचनाएँ मंगल/यूनिकोड में ही भेजें। आप एक साथ कई विधाओं में भी रचनाएँ भेज सकते हैं। प्रवेश शुल्क: 500 रूपए (यदि आप 3 विधाओं में हिस्सा ले रहे हैं तो आपको 500 x 3 = 1500 रूपए भेजने होंगे)। आप एक ही विधा की एक से अधिक पांडुलिपि भी भेज सकते हैं।  यह राशि आपको 9868429241 पर पेटीएम अथवा गूगल पे करना है। आप राशि बैंक में भी ट्रांसफर कर सकते हैं। ईमेल में रचनाओं के साथ पेटीएम की रसीद अवश्य संलग्न करें। भाषा/साहित्यिक विधा: किसी भी भाषा में, किसी भी साहित्यिक विधा में आप भाग ले सकते हैं। चयन प...

पुस्तक प्रकाशन से पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें

अधिकतर लेखक मित्र जब भी अपनी पुस्तक प्रकाशन की योजना बनाते हैं तो उसमें पुस्तक के प्रिंट वर्जन पर विशेष ध्यान देते हैं। आज भी उनका यही मानना है कि ईबुक की तुलना में प्रिंट वर्जन अधिक प्रभावी होता है। हालांकि मैंने भी अपनी कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं और मेरा अनुभव यह कहता है कि पुस्तक प्रकाशन से पूर्व लेखक को अपने उद्देश्य को समझना होगा। उदाहरण के लिए यदि मैं अपनी बात करूं तो जब मैंने पुस्तक प्रकाशन का निर्णय लिया तो मेरा प्रमुख उद्देश्य यही था कि मेरा लेखन अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचे बल्कि ऐसे पाठको तक पहुंचे जो पुस्तक पढ़ने में वास्तव में रुचि लेते हैं या फिर जो पुस्तकों के माध्यम से नए नए विषय तलाशते रहते हैं। प्रिंट के माध्यम से मेरे इस उद्देश्य की पूर्ति संभव नहीं थी इसीलिए मैंने ईबुक को प्राथमिकता दी। ईबुक को प्राथमिकता देने के प्रमुख कारण थे: 1. ईबुक की पहुंच अधिक से अधिक लोगों तक थी। ईबुक के माध्यम से मेरा लेखन दुनिया के कोने-कोने में पहुंच सकता था। 2. यह हमेशा के लिए स्टॉक में रहती अर्थात मुझे बार-बार इसकी प्रतियां छपवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती 3. आवश्यकता पड़ने पर इसमें कभी ...

लघुकथाकारों की भीड़ के बावजूद लघुकथा संकलन उपेक्षा के शिकार क्यों?

इन दिनों एक पोस्ट देखी जिसमें आदरणीय बलराम अग्रवाल जी ने अपने संपादन में प्रकाशित लघुकथा संकलन 'सपने बुनते हुए' का उल्लेख करते हुए इस बात पर असंतोष जताया कि उसमें संकलित लघुकथाकारों ने उस पुस्तक के प्रचार एवं प्रसार हेतु कोई भूमिका नहीं निभाई। उनका कहना था कि लघुकथाकारों ने ना तो पुस्तक क्रय की और ना ही उस पुस्तक पर समीक्षा लिखकर उसके प्रचार-प्रसार में योगदान दिया। हालांकि उनका यह असंतोष एक दृष्टि से सही भी है  किंतु इसके अन्य पक्षों एवं कारणों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि मैं लघुकथा के अपने शुरुआती दिनों की बात करूं तो उन दिनों मुश्किल से दो या तीन ग्रुप ही थे फेसबुक पर जिनमें विशेष रुप से लघुकथा संबंधी गतिविधियां ही की जाती थी किंतु जैसे जैसे लघुकथाकार बढ़ते चले गए व्यापारी एवं दुकानदारों का भी इसमें प्रवेश होता चला गया और उन्होंने अपने निजी स्वार्थ  एवं लाभ के लिए पहले तो लघुकथाकारों को प्रलोभन देकर अपनी ओर आकर्षित किया और फिर उनसे सहयोग राशि लेकर उनकी लघुकथाओं को पुस्तक का रूप दिया। सहयोग राशि लेकर बनाए गए लघुकथा संकलन का स्तर कैसा होगा इसका अनुमान आप भी लगा सकते ह...