अखिलेश द्विवेदी 'अकेला' “मेन पाईप के मुँह पर कोई पत्थर बुरी तरह फँसा है उस्ताद!” वीरे ने बाँस की कोल्ची से कुछ टटोलते हुए कहा। “तो कूद जा। कूदे बिना पत्थर न निकलेगा। टैम खराब करने का कोई फायदा न है।” उसके सुपरवाइजर और उस्ताद मटरू ने सीवर के खुले मेनहोल की तरफ इशारा करके कहा। “हाड़ कँपा देने वाली ठण्ड है उस्ताद?” वीरे ने काँपते हुए कहा। “चुप रह, छोटे-छोटे बच्चों का मुँह देखकर कुछ बोला कर। उन्हें भूखा मारेगा क्या? काम नहीं करेगा तो उन्हें खिलाएगा क्या? आज की दिहाड़ी टूट जाएगी। ले, ठण्ड की दवाई।” उस्ताद ने रसभरी देशी दारू का एक पौव्वा जेब से निकालकर वीरे की तरफ बढ़ा दिया। वीरे के बुझे हृदय की आँखों में रसभरी देखते ही विशेष प्रकार की लौ जल गई। जीभ लुपलुपाते हुए उसने एक ही साँस में पौव्वा खाली कर दिया। उस्ताद ने कमर में रस्सा बाँध दिया। कमर कसे वीरे ने काँटे, कोल्ची, खपची को पैर से ठोकर मारते हुए वीर की भाँति मेनहोल में छलाँग लगा दी। उस्ताद ने गली में खड़े होकर दोनों हाथ उठाकर मुनादी कर दी, “भाइयों, लड़का सीवर में उतर चुका है। कोई भी अपने घर के लैट्रिंग-बाथरूम में न जाए।’ इ...