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अक्टूबर, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

इस बार भी दीवाली यूँ ही मनाओगे!

ललित कुमार मिश्र लड़ियों और दीयों से ज्यादा जगमगाती है जब किसी के चेहरे पर मुस्कान आती है तो इस बार भी दीवाली क्या यूँ ही मनाओगे बताओ न! कितने चेहरों पर मुस्कान लाओगे? पटाखों से ज्यादा रोमांचित करता है जब किसी की आँखों में सपना पलता है तो इस बार भी दीवाली में शोर ही मचाओगे बताओ न! कितनों को उत्साहित कर पाओगे? ये दीये, पटाखे बस कुछ दिन चलेंगे फिर ये अगले साल ही मिलेंगे तो इस बार भी दीवाली कुछ दिन ही मनाओगे बताओ न! कितने घर रोशन कर पाओगे?

शायद कोई पागल रहा होगा !

गौरव भारती एक अधेड़ इंसान लंगड़ाते हुए चल रहा था चलते चलते रुक रहा था लगा रहा था हिसाब अपनी गंदी, लंबी सिकुड़ी उँगलियों पर न जाने किस चीज का मैंने रूककर पूछा - ‘क्या गिन रहे हो’ उसने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोला मेरी खद्दर झोली पर आँख गड़ाए मुँह चबाते हुए बोला - ‘दिखता नहीं क्या सड़क नाप रहा हूँ दूर-दूर तक फैली सड़क लंबी-चौड़ी सड़क रोज नापता हूँ मेरे साथ नापोगे तुम भी रहने दो तुमसे न होगा’ मैले, बेतरतीब बाल खुजाते हुए रूककर उसने एक सवाल पूछा - लेखक हो क्या? मैंने हँसकर कहा - ‘हां, लिख लेता हूँ, कोशिश में हूँ लेकिन तुमने कैसे पता लगाया’ सवाल काटते हुए उसने फिर पूछा - ‘किस जमात के लेखक हो? मने किसके लिए लिखते हो? कौन-सा झंडा?’ अकबकाते हुए मैंने कहा - ‘सबके लिए लिखता हूँ लेखक हूँ, नेता नहीं’ उसने हँसते हुए कहा - ‘फिर दो कौड़ी के लेखक हो तुम चलो, मेरी तरह सड़क नापोगे? बहुत मजा आएगा’ ‘मैं चिढ गया थोड़ा खुद को सँभालते हुए उम्मीद की मोमबत्ती जलाई और बोला - ‘एक दिन मुझे पढ़ा जाएगा तुम देख लेना अच्छे पाठक जिन्दा हैं अभ...

विसर्जन

अखिलेश द्विवेदी 'अकेला' “मेन पाईप के मुँह पर कोई पत्थर बुरी तरह फँसा है उस्ताद!” वीरे ने बाँस की कोल्ची से कुछ टटोलते हुए कहा। “तो कूद जा। कूदे बिना पत्थर न निकलेगा। टैम खराब करने का कोई फायदा न है।” उसके सुपरवाइजर और उस्ताद मटरू ने सीवर के खुले मेनहोल की तरफ इशारा करके कहा। “हाड़ कँपा देने वाली ठण्ड है उस्ताद?” वीरे ने काँपते हुए कहा। “चुप रह, छोटे-छोटे बच्चों का मुँह देखकर कुछ बोला कर। उन्हें भूखा मारेगा क्या? काम नहीं करेगा तो उन्हें खिलाएगा क्या? आज की दिहाड़ी टूट जाएगी। ले, ठण्ड की दवाई।” उस्ताद ने रसभरी देशी दारू का एक पौव्वा जेब से निकालकर वीरे की तरफ बढ़ा दिया। वीरे के बुझे हृदय की आँखों में रसभरी देखते ही विशेष प्रकार की लौ जल गई। जीभ लुपलुपाते हुए उसने एक ही साँस में पौव्वा खाली कर दिया। उस्ताद ने कमर में रस्सा बाँध दिया। कमर कसे वीरे ने काँटे, कोल्ची, खपची को पैर से ठोकर मारते हुए वीर की भाँति मेनहोल में छलाँग लगा दी। उस्ताद ने गली में खड़े होकर दोनों हाथ उठाकर मुनादी कर दी, “भाइयों, लड़का सीवर में उतर चुका है। कोई भी अपने घर के लैट्रिंग-बाथरूम में न जाए।’ इ...

प्रेम करने वाली औरतें

पूजा कश्यप प्रेम करने वाली औरतें दुनिया की सबसे डरपोक जीव होती हैं, अपने हिस्से आये गहरे नील वो उतार देती हैं रात बन्द कमरे में सिरहानो पर अपनी आँख की सारी लालिमा उड़ेंल देती हैं सुबह सूर्य को अर्ध्य देते हुए उनकी नस्ल को ईश्वर ने नही दी कोई मेरुदण्ड वो आसमान नहीं देखतीं उनकी दुनिया का हर छोटा टुकड़ा होता है किसीं के पाँव की जमीन प्रेम करने वाली औरतें हो जाती हैं गूँगी वो कहना नही जानती अपने प्रेम की पीड़ा।

ख़ुदा का घर

संदीप तोमर वह मस्जिद गाँव के बाहर स्थित थी। उस मस्जिद का दरवाजा बन्द था। लोग रात आठ बजे की नमाज अदा करके कब के अपने-अपने घरों को जा चुके थे। बाहर तूफान और बारिश जोरो पर थी। तभी किसी ने मस्जिद का दरवाजा खटखटाया। ‘‘कौन है वहाँ?’’ हाथ में लालटेन पकड़े मौलवी ने दरवाजा खोलते हुए पूछा। ‘‘क्या एक रात के लिए यहाँ आश्रय मिलेगा?’’ बाहर सिर से पाँव तक भीगी एक बुरकाधारी महिला ने उम्मीद भरे स्वर में बहुत ही विनम्रता से पूछा। ‘‘नहीं! यह इबादतखाना है, कोई सराय नहीं। वैसे भी यहाँ कोई जनाना नहीं रह सकती।’’ मौलवी ने बहुत ही रूखे स्वर में उत्तर दिया। ‘‘लेकिन इस तूफान और बारिश में मैं कहाँ जाऊँ बाबा?’’ महिला गिड़गिड़ाई। उसकी बात अनसुनी कर मौलवी पीठ मोड़कर मस्जिद का दरवाजा बन्द करने के लिए पलटा, तो महिला की मायूसी और बढ़ गई। ‘‘बीबीजी! वहाँ सामने कब्रिस्तान है, वहाँ छप्पर के नीचे रात काट लो।’’ पास ही बारिश से बचने के लिए पेड़ के नीचे खड़े एक बुजुर्ग की आवाज सुनकर जैसे डूबते को तिनके का सहारा मिल गया। जलती हुई आँखों से मौलवी को घूरते हुए वह महिला बुदबुदाई, ‘‘लगता है, खुदा ने अपना घर ...

काव्य मंजूषा - 4 हेतु कविताएँ आमंत्रित हैं।

(पुस्तक पेपरबैक और ईबुक, दोनों रूपों में प्रकाशित की जाएगी।) रॉयल्टी: 50% लेखकगण + 30% संपादन मंडल + 20% साहित्यपीठ (पहली 10 प्रति की बिक्री साहित्यपीठ के पास रहेगी)। रॉयल्टी 11वीं प्रति की बिक्री से प्रारंभ होगी। पारदर्शिता हेतु गूगल, पोथी और अमेज़न की सेल रिपोर्ट यहीं प्रति माह के प्रथम सप्ताह में शेयर की जाएगी। नमस्कार मित्रों। सार्थक लेखन हेतु सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। काव्य मंजूषा  -  1, 2 एवं 3 की सफलता के पश्चात वर्जिन साहित्यपीठ काव्य मंजूषा - 4 हेतु कविताएँ आमंत्रित करता है। आप अपनी प्रकाशित/अप्रकाशित 2 बेहतरीन कविताएँ virginsahityapeeth@gmail.com पर भेज दें।  सब्जेक्ट में " काव्य मंजूषा - 4, 2019 हेतु " अवश्य लिखें। प्लेटफॉर्म: ईबुक अमेज़न, गूगल प्ले स्टोर, और गूगल बुक्स के साथ सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी में उपलब्ध होगी जबकि पेपरबैक पोथी की वेबसाइट से अथवा हमसे मँगवा सकेंगे। समय सीमा:  कविताएँ भेजने की अंतिम तिथि है - 25 अक्टूबर, 2019।   15 नवंबर, 2019 तक चयनित कवियों की सूची इसी ब्लॉग पर जारी की जाएगी। अतः ब्लॉग...

ननद भौजाई

राजकमल चौधरी बीस हज़ार लोगों की एक बस्ती है। इस बस्ती में एक घर है जहाँ एक ननद और एक भौजाई रहती है। दोनों विधवा। कोई बाल-बच्चा नहीं। कोई पुरुष नहीं। दोनों देह व्यापार करके जीवन-यापन करती हैं। उन दोनों का मानना है कि बीस हज़ार की बस्ती में दो सौ बंटे तो होंगे ही - जो उनके लिये पर्याप्त हैं। एक दिन भाभी ननद से पूछती है कि कहाँ गयी थी तो ननद जवाब देती है कि किसी बंटे के पास गयी थी। पाँच रूपये मांगे थे लेकिन बंटे ने तीन रुपये शाम तक देने का वायदा कर दो रुपये चोली में ठूंसे। फिर बंटा उसे खेतों की तरफ़ ले गया। दोनों गुत्थम-गुत्था थे कि एक पुलिस का सिपाही आ गया। सिपाही को देखकर बंटा भगा। ननद तड़पती रही। सिपाही चला गया। इतने में ननद ने सुना कि उसे कोई पुकार रहा है। वह भागकर गयी तो देखा बंटा तड़प रहा है और उसे पुकार रहा है। ननद ख़ुद कामातुर थी और उसे लगा बंटा भी कामातुर होकर तड़प रहा है। ननद जाकर उसको थामती है और उसके साथ सम्भोग करने लगती है। काम का ज्वार उतरता है तो देखती है कि बंटे का शरीर नीला पड़ चुका है और बंटा उसकी बाहों में ही मर जाता है। दरअसल बंटे को सांप ने काट लिया था और वह उसे बचाने...

लिखिए और कमाइए!

नमस्कार मित्रवर! सार्थक लेखन हेतु सभी को शुभकामनाएँ। आज से हम इस योजना को लागू करने जा रहे हैं। आप किसी भी विधा में लिख सकते हैं। आपको न्यूनतम 1000 अंक अर्जित करने होंगे। अंकों का विवरण इस प्रकार है: रचना को तीन तरह से पसंद किया जाता है। पहला, उसे पढ़ा जाता है। दूसरा, उसपर प्रतिक्रिया अथवा टिप्पणी दी जाती है और तीसरा, उसे शेयर किया जाता है। इन्हें ध्यान में रखते हुए ही इनके अंक निर्धारित गए हैं। 1. रचना पढ़े जाने पर: 0.5 अंक 2. रचना पर की गई टिप्पणी: 1 अंक 3. रचना शेयर होने पर: 2 अंक रचना पढ़े जाने से आप अधिकतम 850 अंक अर्जित कर सकते हैं। शेष 150 अंक आपको अन्य दोनों माध्यमों से अर्जित करने होंगे। 1000 अंक अर्जित करने पर आपके पास दो विकल्प रहेंगे: आपको 500 रुपये और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाएगा। अथवा किन्हीं तीन रचनाओं में एक-एक हज़ार अंक अर्जित करने पर आपकी कोई भी एक पुस्तक वर्जिन साहित्यपीठ द्वारा प्रकाशित की जाएगी। यह पुस्तक ईबुक और प्रिंट रूपों में प्रकाशित की जाएगी और एक लेखकीय प्रति लेखक को प्रदान की जाएगी। प्रिंट पुस्तक भी ऑनलाइन रहेगी जिसकी प्रतियाँ आप या पाठ...

काला पानी

माला झा "अरे राधेलाल, फिर चाय का ठेला! तुम तो अपना धंधा समेटकर अपने बेटे और बहू के घर चले गए थे।" "अरे सिन्हा साब! वो घर नही, काला पानी है, काला पानी! सभी अपनी ज़िन्दगी में इतने व्यस्त हैं कि न कोई मुझसे बात करता और न कोई मेरी बात सुनता। बस सारा दिन या तो टीवी देखो या फिर छत और दीवारों को ताको। भाग आया। यहाँ आप लोगों के साथ बतियाते और चाय पिलाते बड़ा अच्छा समय बीत जाता है। अरे, आप किस सोच में पड़ गए?" "सोच रहा हूँ कि मै तो तुम्हारी तरह चाय का ठेला भी नहीं लगा सकता। बेटा बहुत बड़ा अफ़सर जो ठहरा।" फीकी हँसी के साथ सिन्हा साहब ने चाय का प्याला होठों से लगा लिया।

मोल भाव

ममता दीक्षित शुक्ला दीपक रोज की तरह जल्दी-जल्दी टीवी के सामने नाश्ता कर रहा था। एक हाथ में रिमोट और दूसरे हाथ में चाय का कप। अचानक कप होंठों तक लाकर ठिठक गया। आँखें उसने समाचार चैनल पर गड़ा दीं। "लो, अब फिर से डांस बार खुलने जा रहे हैं। ये नेता भी न! वोट के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। फिर वही लड़कियों का शोषण! छोटे-छोटे शहरों से नौकरी के नाम पर बहला-फुसलाकर लड़कियों को लाना और डांस बार में....छी!" गुस्से में उसका चेहरा तमतमा गया। "साब पंखा चालू कर दूँ? पोंछा जल्दी सूख जाएगा।" बीस साल की कमली ने जब आवाज लगाई तब उसका ध्यान टूटा। इधर गीला फर्श पंखे की हवा से सूखता जा रहा था, उधर दीपक का कंठ पोछा लगाती कमली के कुर्ते के गले में उलझ सूखता जा रहा था। उसने झट से मोबाइल निकाला और अपने सेक्रेट्री से कहा, "सुनो! ज़रा जरूरी काम आ गया है। मीटिंग एक घंटे डिले कर दो!" "सुन कमली! तुझे अल्का से एक महीने के कितने मिलते हैं?" "क्यू साब? तीन हजार।" "ले रख, लौटाने और किसी को कहने की जरूरत नहीं। दरवाजा बंद कर दे।" कहते हुए दी...

जब वस्त्र नहीं थे

ललित कुमार मिश्र जिन दिनों वस्त्र पैदा नहीं हुए थे उन दिनों स्त्रियों को किस प्रकार लज्जित किया जाता था? उन्हें किस तरह से दण्डित किया जाता था? किस तरह गिराया जाता था उन्हें उन्हीं की नज़रों में? क्या उन दिनों भी वे बलात्कार का शिकार होती थीं? क्या उन दिनों भी नग्नता अभिशाप थी? कैसी होती थी उन दिनों आदर्श स्त्री?

आधार

ललित कुमार मिश्र शनिवार का दिन था। सप्ताह का आखिरी दिन। इस वीकेंड में भी सुनील और रमेश ने नेचर वॉक की योजना बनाई थी। सुनील ने रमेश को आधार केंद्र पर ही बुला लिया था। इंतज़ार की घड़ी बढ़ती देख रमेश ने सुनील से पूछा, "और कितने फॉर्म बाकी है?" "बस यार, ये लास्ट है।" "अच्छा तो एक काम कर, ये फॉर्म मैं भर देता हूँ, तू फ्रेश हो जा इतने।" "अच्छा ठीक है।" सुनील ने रमेश को अपनी कुर्सी दे दी और वाशरूम की ओर बढ़ गया। इधर रमेश की उँगलियाँ कंप्यूटर के की-बोर्ड पर नर्तन करने लगीं। सुनील जब तक लौटकर आया, रमेश अपना काम निपटा चुका था। "मैंने सारा परफेक्ट टाइप कर दिया है। दो बार चेक भी कर लिया है। तुझे बस एंटर मारना है।" सुनील ने पूरे फॉर्म पर नज़र दौड़ाई और फिर नाम में थोड़ा बदलाव कर एंटर मार दिया। रमेश आश्चर्य से बोला, "अबे नाम ठीक तो था! गलत कर दिया तूने। अब दोबारा बेचारे को आना पड़ेगा और 50 रुपये देने पड़ेंगे अलग।"  रमेश की बात सुन सुनील मुसकराया और बोला, "अबे अगर इनका आधार पहली बार मे ही ठीक करके देंगे तो हमारा आधार तो बिग...

वर्जिन

ललित कुमार मिश्र मैं वर्जिन हूँ विवाह के इतने वर्षों के पश्चात् भी मैं वर्जिन हूँ संतानों की उत्पत्ति के बाद भी। वो जो तथाकथित प्रेम था वो तो मिलन था भौतिक गुणों का और यह जो विवाह है यह मिलन था दो शरीरों का मैं आज भी वर्जिन हूँ अनछुई स्पर्शरहित। मैं मात्र भौतिक गुण नहीं मैं मात्र शरीर भी नहीं मैं वो हूँ जो पिता के आदर्शों के वस्त्र में छिपी रही मैं वो हूँ जो माँ के ख्वाबों के पंख लगाये उड़ती रही मैं वो हूँ जो पति की जरूरतों में उलझी रही मैं वो भी हूँ जो बच्चों की खुशियों के पीछे दौड़ती रही। मैं अब वर्जिन नहीं रहना चाहती मैं छूना चाहती हूँ खुद को।