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फ़रवरी, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

एच के जोशी जी के उपन्यास 'मेरी यादों के झरोखों से' का अंश

...मधु फोन पर किशोर से बात करती रही वह भूल चुकी थी किवह आँचलपुर में किशोर के घर आई हुई है,समय इतनी तेजी से दौड़ता है मानो किसी से स्पर्द्धा हो,और सच तो बात यह है कि जहाँ प्रेम की चर्चा होती है वहाँ समय क्या कई शताब्दियों का समय भी कम है प्रेम की चर्चा करने में।यही स्तिथि हो गई थी मधु की,वह फोन पर बात करती जारही थी हर प्रश्न और उनके उत्तर स्वतःदोनो के ओर से बेरोक टोक आदान प्रदान होरहे थे,अतः कब समय गुजरा पता ही नही चला। दीदी घर नही चलोगी।चन्द्रा बोली। चलेंगे जरा थोड़ी देर बात कर लेने दे।मधु ने चन्द्रा को जबाब दिया। क्या  कह रही हो।दूसरी ओर से किशोर ने उससे पूछा। जी...वह चन्द्रा साथ है उसे बोला था मैंने।मधु बोली। चन्द्रा ड्राईंग रूम से वाहर आचुकी थी माजी के कहने पर मानिसि और चन्द्रा दोनो घरेलू काम मे ब्यस्त होगई आज वैसे भी दीपावली का त्यौहार मनाया जा रहा था चारो ओर खुशियों का वातावरण था।धीरे धीरे दिन छुप गया ,मांजी ने आकर ड्रायगरूम की लाइट आन की मधु ने झिझकते हुए फोन आहिस्ता से रख दिया। ओ माई गॉड....।इतना समय बीत गया।मधु के मुहँ से स्वता निकला। कोई बात नही बेटी।चलो अब फ्रेस हो ल...

संतोष श्रीवास्तव की कविताएँ

आंदोलिता हवाएँ -------------------- ये आंदोलिता हवाएँ टिकने न देंगी मोम पर जलती, थरथराती लौ अंधेरे से निपटने की तमाम कोशिशें नाकाम करने पर उतारू इन हवाओं का नहीं कोई ठिकाना गुज़रती जा रही हैं कुसुम दल से, डालियों से, झील के विस्तार को झकझोरती मोम के आगोश में लौ का बुझता, मरता अस्तित्व पर यह उतना आसान भी न था सम्हाल रखा है एक आतुर प्रण लिए तरल मोम ने बूँद सी लौ को लड़ने की पूरी ताकत से एक आंदोलन हवा के खिलाफ वहाँ भी तो था ****** आर्त्त पुकार ++++++++ मैंने अरमानों के कुछ बीज अपनी मुट्ठी में दबा रखे हैं और आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूं मौसम की दस्तक का चारों ओर नि:शब्द सन्नाटा है पानी की एक बूंद तक नहीं आषाढ़, सावन,भादो भरोसा दिलाते रहे कहीं धुनके हुए कहीं सिलेटी बादलों से हवा संग छितराते रहे पर बरसे नहीं सूखी, पपड़ाई धरती करती रही प्रतीक्षा अपने प्रियतम बादलों के बरसने का कोख में दबे बीजों के झुलस जाने की आशंका धरती का कलेजा कर रही चूर चूर आता तो रहा है अब तक मौसम सिलसिलेवार इस बार क्या हुआ मौसम की आवाजाही को बूढ़ी धरती ...

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध की कविताएँ

१ ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये । शिथिलता कहीं कोई आने न पाये ।। बड़ी ही प्रबल हैं विषय वासनायें सदा अपने चंगुल में मन को फसाँये । वही बच सके जो रहे साफ निश्छल औ प्रभु की कृपा से गये जो बचाये ।।१।। यहाँ मोहमाया ने सबको भुलाया न कोई समय पर कभी काम आया । हरेक रास्ते में है धोखे हजारों सदा कर्म अपने ही बस काम आये ।।२।। है दुनियाँ पुरानी मगर अजनबी है कभी कुछ है लेकिन अलग कुछ कभी है । बदलती रही सदा ये अपनी चालें करेगी ये कल फिर कोई क्या बताये ?३।। है बस अपना खुद का औ प्रभु का सहारा न ऐसा कोई जो कभी न हो हारा। थके हारे मन को मिली चेतना नई तभी जब भी  भगवान ने पथ दिखाये ।।४।। सदा ध्यान से शुध्दता मन ने पाई यही शुध्दता ही है सच्ची कमाई । सदा ज्योति बन आये भगवान आगे कि निष्पाप मन से गये जब बुलाये ।।५।। २   नेताओं से... देश सेवा परम उच्च आदर्श है लोगों ने जानें तक दी हैं इसके लिये। सोचिये आज क्या कर रहे आप हैं यह उठापटक है सारी किसके लिये ? देश सेवा में मन है तो उसके लिये किसी कुर्सी या पद की जर...

रेखा तोमर की कहानी

ऑक्सीजन रात की बची सब्जी भरकर परांठा बनाया, रोल बनाकर मुँह में जल्दी जल्दी निगलने लगी, पापा की बात याद आई"बेटा खाना चबा चबा कर खाया करो, जल्दी पचता है" लेकिन अब जिंदगी इतनी जल्दबाजी में है कि खाना पचाने की फुर्सत किसे है? देखा जाए तो इस समय खाने से ज्यादा जरूरत तो दवाइयों की पड़ती है, वो बिस्तर पर लेटे हुए मुझे ही देख रहे थे "फिर कहीं खो गई"? "उम्मम, नही ऐसे ही" "उमा, तुम पर बोझ बनकर रह गया हूँ" आशीष के मुँह से निकली यही बात मेरे हृदय में शूल सी चुभती है, आंसुओ की धार रोकते रोकते भी  बह निकली। उनका हाथ कस कर दोनो हाथों के बीच थामा और बोली"मेरी लाइफ हो तुम, ये सब बोलकर मेरे प्यार का मज़ाक क्यो उड़ाते हो?तुमने पूरे समाज से लड़ कर मुझसे शादी की..मैं तुम्हारे लिए इन हालातों से नही लड़ सकती"? "बिल्कुल लड़ सकती हो, मेरी शेरनी हो तुम" उनके माथे पर चुम्बन दे मैं निकल पड़ी अपनी उस सस्ती सी जॉब पर जहाँ लोगो के ईमान उससे भी सस्ते है लव मैरिज की है तो परिवार सहायता के लिए साफ मना कर चुका, इनके परिवार के अनुसार मुझसे शादी की इ...

राजनन्दिनी रावत की कविताएँ

(1)  चयन बलात्कार पर बात करने के लिए हम बलात्कार की ताजा ख़बर का इंतजार करते हैं जब कोई बेटी सो जाती हैं तब देश जागता हैं हमें इतिहास में पद्मावती को पढ़ाया हैं पद्मावती के जौहर को पढ़ाया जाता हैं हम नहीं सोचते पद्मावती के पास इतना समय तो था कि वो जौहर कर सकी पर साधारण स्त्री के पास तो इतना भी समय नहीं होता... हम नहीं सोचते कि एक औरत खुद को आग में झोंक देने को तैयार हैं पर आदमी की मानसिकता वो औरत को छोड़ना ही नहीं चाहता हम स्त्री की अस्मत को शरीर से जोड़ लेते हैं और अस्मत को स्त्री के स्वाभिमान से जो सही भी हैं लेकिन क्या अस्मत लूट ली जाने वाली चीज़ हैं??? मैं सोचती हुँ कि यदि ऐसा शण आ जाए तो औरत को क्या होना चाहिए??? पद्मावती या फूलन देवी...! मैं सोचती हूँ कि ऐसे शण में औरत को पद्मावती होना चाहिए क्योंकि वो सिर्फ शरीर नहीं नोंचते वो रूह तक को नोच देते हैं.... पर एक साधारण स्त्री के पास तो इतना भी समय नहीं होता... कि वो जौहर कर सके !!! (2)  समझदार लड़कियाँ प्रेम में पड़ जाती हैं अक्सर समझदार लड़कियाँ वही समझदार लड़कियाँ जो आती हैं अव्वल अप...

सारिका भूषण की कविताएँ

1. समुद्र  ------- एकटक निहार रही थी लहरों को बन एक शून्य शून्य तक निहार रही थी दूर दिखती लहरें अब पास दिख रही थी लहरों के वेग देख पहले डरी - डरी थी पर अब खड़ी थी सामना करने को तैयार क्योंकि अब पाँव जमा चुकी थी रेत की ज़मीन पर बेख़ौफ़ निर्विकार होकर । लहरें टकराकर लौट रही थीं पैरों तले ज़मीन भी सरकती जा रही थी हिल जा रही थी मैं मगर मेरे इरादों को गिरना मंजूर नहीं था । 2. मृगनयनी -------------- हां ! मृगनयनी थी वह उसकी बड़ी - बड़ी आँखें और आंखों से बोलती वह भाषा का तो पता नहीं पर उन गहरी आंखों में अकुलाते सपने मुझे बहुत दिखे थे । हां ! मृगनयनी थी वह मचलती थीं उसकी चंचल पुतलियां और पुतलियों में थी एक अजीब सी चमक जो उसे औरों से अलग बता रहे थे । हां ! मृगनयनी थी वह उसके श्यामल चेहरे पर आंखों के सामने गिरते काले ,घुंघराले और उलझे केश मेरे न चाहते हुए भी मुझे और कुछ लफंगों को उलझाते ही जा रहे थे । हां ! उसी मृगनयनी को जिसके कांधे पर लटक रहा था मटमैला झोला और झोले से हुलक रहे थे रास्ते से चुने हुए कचरे जो उसके लिए रोटी ...

डॉ. तरुणा दाधीच की लघुकथाएँ

1-  हिस्से का समय       ओ...ओ..ओ....गाते हुए और घुटने को हिला रही सृष्टि की नजर फोन पर गढ़ी थी और दोनों हाथों से मैसेज टाईप करने में इतनी व्यस्त हो गई की गोद में सो रही नीरा को भूल ही गयी।ऐसा अक्सर होता रहता, व्यस्त दिनचर्या के कारण सृष्टि परिवार और दोस्तों से थोड़ा कट सी गयी थी, तो जब बच्ची को सुलाने आती तब फोन को देखना उसके लिए तय कार्य रहता।सृष्टि की नज़र जब नीरा पर पड़ी तो स्फारित नेत्रों से मानो कुछ प्रश्न कर रही उसे अनिमेष देख रही थी, सृष्टि ने आँखें दिखाकर सुलाना चाहा पर बहुत देर तक जगी रही।अगले दिन फिर वही देख सृष्टि ने कुछ विचार कर फोन को एक ओर रख उसे थपथपाने लगी।सृष्टि अवाक् थी, देर तक सोने वाली नीरा आज इतना जल्दी सो गई,जब उसने देखा नीरा के चेहरे पर  संतुष्टि का भाव और छोटे से होंठों पर लम्बी सी मुस्कान है, सृष्टि को समझते देर नहीं लगी कि वह उसका सारा ध्यान स्वयं पर चाहती थी।आज जब नीरा को सुलाने गयी तो ,नीरा ने बिना विलम्ब किये फोन पर चल रहे हाथ को पकड़कर अपने ऊपर रख लिया और करुण नेत्रों से उसे देखने लगी,मानो पूछ रही हो ,मेरी क्या गलती हैं जो आप मेर...

भावना ठाकर की कहानी

कश्मकश ज़िंदगी की क्यूँ कभी-कभी लगता है ज़िंदगी खूबसूरत भी है ओर नासूर भी पता नहीं क्यूँ मैं इतनी अनमनी सी रहती हूँ सबकुछ तो है फिर भी एक कमी सी कचोटती है, वैसे भूल जाना चाहिए मुझे बीते कल को हथेलियों पर लिए फिरती हूँ, पर क्या पहले प्यार को भूल जाना इतना आसान होता है दिल में एक ही रंजिश पलती है सालों से एक सवाल लिए वो क्यूँ नहीं आया। काश कहीं वो एक बार मिल जाए तो पूछ लूँ उसे जो आज मेरी इस उखड़ी- उखड़ी सोच का ज़िम्मेदार है, मेरे खयालों की रफ़्तार को तोड़ती कुणाल की आवाज़ ने चौंका दिया रिया आज रात नये बोस की ज्वाईनिंग की खुशी में होटेल होलीडे इन में पार्टी है, ओर हाँ तुम्हें वो रेड साड़ी पहनकर आना है, आज पहली बार ऑफ़िशियल पार्टी में सबको विद फैमिली बुलाया है.!  तुम देखना बंदे की मल्लिका को देखकर जलन होगी आज मेरे सारे कलिगस को, पर मैंने टालने की कोशिश में कुणाल से कहा प्लीज़ हो सके तो तुम अकेले चले जाओ मुझे बख़्श दो मैं आदी नहीं एसी पार्टीस की.! एसी पार्टीयों में लेड़ीज़ की फ़ालतू की फ़ेशन कंपिटीशन होती है, एक दूसरे से स्मार्ट दिखने की बचकानी हरकतें, ओर तुम जेन्टस लोगो...

शिखा सिंह भारद्वाज की कविताएँ

(1) फिर भी मैं परायी हूँ बहू.... ओ बहू..... सुन तो जरा मेरे कमरे में से चश्मा तो लाना, जी.... माँ जी... क्षण बीते फिर सुनती हूं मैं बहू.... ओ बहू..... सुन.... दो कप चाय बना ला उसके साथ पकौड़े भी तल लें.. वो भी गोभी के जी..... माँ जी..... वक्त का पहिया घूमे जैसे वैसे मैं भी घूमा करती बहू.... ओ बहू..... सुन तो..... रागनी के काॅलेज जाने का वक्त हो चुका है उसे अपना लाल वाला पर्स तो दे दे। जी..... माँ जी....... मेरे किस्मत की क्या यही नीति है?... या हर बहू की यही रीति है... बहू .... ओ बहू..... 'राहुल के पापा आए हैं ' उनके लिए खाना तो लाकर दे दे। जी.... माँ जी.... मुझे मेरे घर से यही सीख मिली हैं सास-ससुर माँ और पिता से बढ़कर है... बहू.... ओ बहू..... स्कूल की छुट्टी हो गई होगी बस आ गई होगी जा बच्चों को ले आ जी..... माँ जी.... कहाँ थी पहले, अब कहाँ खड़ी हूँ ये सोच-सोच खुद से डरी हूँ बहू.... ओ बहू..... सुन.... रात के खाने पर राहुल की मौसी आ रही है खाना थोड़ा चटपटा बनाना रायता, गोभी के पराठे, गाजर का हलवा, धनिए की चटनी और... जो त...

विजय विभोर की लघुकथाएँ

१. कुत्ता कुत्ते -------------------------- नन्ही पिंकी को ट्यूशन पर हमेशा दादी जी या मम्मी ही छोड़ने जाती थीं| लेकिन आज दोनों ही घर पर नहीं थीं| ट्यूशन का टाइम हुआ तो पिंकी ने अपना बस्ता उठाया और ट्यूशन के लिए निकल ली| झबरु ने उसे जाता देखा तो दबे पाँव उसके पीछे-पीछे हो लिया| रास्ते में कुछ लालची निगाहों ने देखा कि पिंकी आज अकेली ही चली आ रही है। लेकिन वे नज़रें झबरू को नहीं देख सकी। पिंकी अपनी मस्ती में चल रही थी इसलिए उसको भी पता नहीं चला कि उसके पीछे कौन आ रहा है, कौन नहीं| पिंकी ट्यूशन सैंटर के अंदर पहुँची तो झबरु भी वापिस घर की तरफ हो लिया, क्यूंकि घर पर कोई था नहीं| ट्यूटर ने आज दस मिनिट पहले ही क्लास खत्म कर दी| पिंकी अपने घर की तरफ निकली तो वे भूखी-लालची निगाहें अपनी दो टाँगों के सहारे उसके पीछे लग गयी। जैसे ही उन्होंने गलत इरादे से पिंकी पर हाथ डालने की कोशिश की तभी दूर से भौंकता/दौड़ता हुआ झबरु उन्हें पिंकी की तरफ आता दिखाई पड़ा। अपने प्रति किसी अनहोनी की आशंका से उस वक्त उन्होंने अपनी जान बचाकर भागने में ही भलाई समझी| २. तारों की छाँव ------------------...