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लकड़ी की काठी - 3 हेतु बाल कविताएँ आमंत्रित हैं।

रचना भेजने की अंतिम तिथि: 25 नवंबर, 2020 नमस्कार मित्रों। सार्थक लेखन हेतु सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। निमंत्रण: लकड़ी की काठी  - 1 एवं 2 की सफलता के पश्चात वर्जिन साहित्यपीठ लकड़ी की काठी - 3 हेतु बाल कविताएँ आमंत्रित करता है। आप अपनी प्रकाशित/अप्रकाशित 2 बेहतरीन बाल कविताएँ virginsahityapeeth@gmail.com पर भेज दें।  सब्जेक्ट में "लकड़ी की काठी - 3, 2020 हेतु" अवश्य लिखें। संपादक के लिए: जो संपादक मित्र इस संकलन से जुड़ना चाहते हैं वे 9971275250 पर सम्पर्क कर सकते हैं। समय सीमा: बाल कविताएँ भेजने की अंतिम तिथि है - 25 नवंबर, 2020।  10 दिसंबर तक चयनित रचनाकारों की सूची प्रकाशित कर दी जाएगी और 28 दिसंबर, 2020 तक संकलन प्रकाशित कर दिया जाएगा। पाण्डुलिपि भेजने से पूर्व निम्नलिखित महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर अवश्य ध्यान दें:  1. कविताएँ मंगल/यूनिकोड फॉण्ट में भेजें  2. साथ में फोटो और संक्षिप्त परिचय भी अवश्य भेजें  5. भेजने से पूर्व अशुद्धि अवश्य जाँच लें। अधिक अशुद्धियाँ होने पर रचना अस्वीकृत की जा सकती है। 5. ईमेल में इसकी उद्घोषणा करें कि उनकी रचना मौलिक है और किसी भी...

नागार्जुन लोकप्रिय पुस्तक सम्मान की उद्घोषणा

अगस्त 2020 की सेल रिपोर्ट के आधार पर अगस्त माह की लोकप्रिय पुस्तक के सम्मान हेतु पुस्तक का चयन कर लिया गया है। इस सम्मान के तहत 51 रुपये और प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाएगा। 3 लोकप्रिय पुस्तकों की सूची दी जा रही है जिसमें से प्रथम को नागार्जुन लोकप्रिय पुस्तक सम्मान से सम्मानित किया जा रहा है। दूसरे और तीसरे स्थान पर पहुँची पुस्तक को प्रशस्ति पत्र प्रदान किया जाएगा। इन पुस्तकों की बिक्री भी साझा की जा रही है: 1. एक दिन सभी स्त्रियाँ नग्न हो जाएँगी (काव्य संग्रह) - 160 2. वर्जिन (काव्य संग्रह) - 121 3. गांधी देशद्रोही था! (काव्य संग्रह) - 84 (नोट: अगस्त 2020 की सेल रिपोर्ट पहले ही साझा की जा चुकी है पिछली पोस्ट में।) जिज्ञासा अथवा शंका समाधान हेतु सम्पर्क कीजिए: वर्जिन साहित्यपीठ 9971275250
 
 

पुस्तक निर्माण के समय लेखक अकसर भ्रमित हो जाते हैं

पुस्तक निर्माण की प्रक्रिया के दौरान लेखक अकसर भ्रमित हो जाते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि पाठक पुस्तक पढ़ते क्यों हैं। यह सच है कि कोई भी पुस्तक सफलताओं की सीढ़ियां अपनी रचनाओं के बलबूते ही चढ़ती है किंतु यह भी सत्य है कि रचनाओं तक पाठकों को आकर्षित करने के लिए अन्य पहलुओं पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। अन्य पहलुओं में पुस्तक की साज-सज्जा और शीर्षक आते हैं। यदि हम रचनाओं की बात करें तो रचनाओं का स्तर लेखक का व्यक्तित्व और उसका अनुभव निर्धारित करता है किंतु उसकी वर्तनी और व्याकरण संबंधी त्रुटियों के शोधन के लिए विशेषज्ञ अर्थात संपादक की आवश्यकता होती है। विडंबना यह है कि 100 में से 99 लेखक इसकी पूर्ण रूप से उपेक्षा कर देते हैं। वे पुस्तक की साज-सज्जा और मार्केटिंग पर एक अच्छी-खासी राशि खर्च करने से नहीं हिचकिचाते किंतु जब संपादकीय खर्च की बात आती है तो वे इतनी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी खुद ले लेते हैं जिसका परिणाम होता है अशुद्धियों से भरपूर पुस्तक। यह ठीक ऐसे ही है जैसे आपका पसंदीदा भोजन किसी गंदी-सी प्लेट में परोस दिया जाए। अब बात करते हैं अन्य पहलुओं की, जिसमें पुस्तक की साज-सज्जा और शीर्...

सम्मान की घोषणा: 'माह की लोकप्रिय पुस्तक' एवं 'वर्ष की लोकप्रिय पुस्तक'

वर्जिन साहित्यपीठ सेल रिपोर्ट के आधार पर हर महीने 'माह की लोकप्रिय पुस्तक' की घोषणा करेगी। लोकप्रिय पुस्तक के लेखक को 51 रुपये के साथ प्रमाण पत्र सम्मानस्वरूप प्रदान किया जाएगा।  वर्ष के अंत में 'वर्ष की लोकप्रिय पुस्तक' की भी घोषणा की जाएगी। पुस्तक के लेखक को 501 रुपये के साथ प्रमाण पत्र सम्मानस्वरूप प्रदान किया जाएगा। सम्मान राशि को समय के साथ बढ़ाया जाएगा। शंका अथवा जिज्ञासा हेतु सम्पर्क कीजिए: वर्जिन साहित्यपीठ 9971275250

जनकवि/जनलेखक नागार्जुन प्रतियोगिता (2020)

वर्जिन साहित्यपीठ जनकवि/जनलेखक प्रतियोगिता 2020 हेतु कविता/लघुकथा/कहानी/निबंध/लेख आमंत्रित करता है 1. प्रथम पुरस्कार: 3100 रुपये 2. अन्य पुरस्कार: टॉप 10 में पहुँचने वाले अन्य सभी  लेखकों की एक पुस्तक पुरस्कारस्वरूप प्रकाशित की जाएगी। उन्हें 1 लेखकीय प्रति भी प्रदान की जाएगी। निर्णायक मंडल: गूगल प्ले स्टोर के पाठक प्रवेश प्रक्रिया: आपको न्यूनतम 21 कविताएँ/लघुकथाएँ अथवा 11 कहानियाँ अथवा 15 लेख/निबंध परिचय और फोटो के साथ virginsahityapeeth@gmail.com पर भेजना है। भेजने से पूर्व अशुद्धियाँ जांच लें और रचनाएँ मंगल/यूनिकोड में ही भेजें। आप एक साथ कई विधाओं में भी रचनाएँ भेज सकते हैं। प्रवेश शुल्क: 500 रूपए (यदि आप 3 विधाओं में हिस्सा ले रहे हैं तो आपको 500 x 3 = 1500 रूपए भेजने होंगे)। आप एक ही विधा की एक से अधिक पांडुलिपि भी भेज सकते हैं।  यह राशि आपको 9868429241 पर पेटीएम अथवा गूगल पे करना है। आप राशि बैंक में भी ट्रांसफर कर सकते हैं। ईमेल में रचनाओं के साथ पेटीएम की रसीद अवश्य संलग्न करें। भाषा/साहित्यिक विधा: किसी भी भाषा में, किसी भी साहित्यिक विधा में आप भाग ले सकते हैं। चयन प...

पुस्तक प्रकाशन से पूर्व ध्यान रखने योग्य बातें

अधिकतर लेखक मित्र जब भी अपनी पुस्तक प्रकाशन की योजना बनाते हैं तो उसमें पुस्तक के प्रिंट वर्जन पर विशेष ध्यान देते हैं। आज भी उनका यही मानना है कि ईबुक की तुलना में प्रिंट वर्जन अधिक प्रभावी होता है। हालांकि मैंने भी अपनी कई पुस्तकें प्रकाशित की हैं और मेरा अनुभव यह कहता है कि पुस्तक प्रकाशन से पूर्व लेखक को अपने उद्देश्य को समझना होगा। उदाहरण के लिए यदि मैं अपनी बात करूं तो जब मैंने पुस्तक प्रकाशन का निर्णय लिया तो मेरा प्रमुख उद्देश्य यही था कि मेरा लेखन अधिक से अधिक पाठकों तक पहुंचे बल्कि ऐसे पाठको तक पहुंचे जो पुस्तक पढ़ने में वास्तव में रुचि लेते हैं या फिर जो पुस्तकों के माध्यम से नए नए विषय तलाशते रहते हैं। प्रिंट के माध्यम से मेरे इस उद्देश्य की पूर्ति संभव नहीं थी इसीलिए मैंने ईबुक को प्राथमिकता दी। ईबुक को प्राथमिकता देने के प्रमुख कारण थे: 1. ईबुक की पहुंच अधिक से अधिक लोगों तक थी। ईबुक के माध्यम से मेरा लेखन दुनिया के कोने-कोने में पहुंच सकता था। 2. यह हमेशा के लिए स्टॉक में रहती अर्थात मुझे बार-बार इसकी प्रतियां छपवाने की आवश्यकता नहीं पड़ती 3. आवश्यकता पड़ने पर इसमें कभी ...

लघुकथाकारों की भीड़ के बावजूद लघुकथा संकलन उपेक्षा के शिकार क्यों?

इन दिनों एक पोस्ट देखी जिसमें आदरणीय बलराम अग्रवाल जी ने अपने संपादन में प्रकाशित लघुकथा संकलन 'सपने बुनते हुए' का उल्लेख करते हुए इस बात पर असंतोष जताया कि उसमें संकलित लघुकथाकारों ने उस पुस्तक के प्रचार एवं प्रसार हेतु कोई भूमिका नहीं निभाई। उनका कहना था कि लघुकथाकारों ने ना तो पुस्तक क्रय की और ना ही उस पुस्तक पर समीक्षा लिखकर उसके प्रचार-प्रसार में योगदान दिया। हालांकि उनका यह असंतोष एक दृष्टि से सही भी है  किंतु इसके अन्य पक्षों एवं कारणों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि मैं लघुकथा के अपने शुरुआती दिनों की बात करूं तो उन दिनों मुश्किल से दो या तीन ग्रुप ही थे फेसबुक पर जिनमें विशेष रुप से लघुकथा संबंधी गतिविधियां ही की जाती थी किंतु जैसे जैसे लघुकथाकार बढ़ते चले गए व्यापारी एवं दुकानदारों का भी इसमें प्रवेश होता चला गया और उन्होंने अपने निजी स्वार्थ  एवं लाभ के लिए पहले तो लघुकथाकारों को प्रलोभन देकर अपनी ओर आकर्षित किया और फिर उनसे सहयोग राशि लेकर उनकी लघुकथाओं को पुस्तक का रूप दिया। सहयोग राशि लेकर बनाए गए लघुकथा संकलन का स्तर कैसा होगा इसका अनुमान आप भी लगा सकते ह...

लेखकों के लिए सुनहरा अवसर (सीमित अवधि के लिए)

मात्र 5000 रुपये में अपनी 3 पुस्तकें प्रकाशित करवाएँ। ईबुक और प्रिंट दोनों रूपों में पुस्तकें प्रकाशित की जाएँगी। दोनों वर्जन - ईबुक और प्रिंट, ऑनलाइन उपलब्ध होंगे।  पंजीकरण: 1 से 10 जुलाई तक आप इस हेतु पंजीकरण करवा सकते हैं। तीनों पुस्तकें आप मनचाहे अंतराल पर प्रकाशित करवा सकते हैं। प्रकाशन: ईबुक अमेज़न, गूगल बुक्स और गूगल प्ले स्टोर पर उपलब्ध होगी जबकि प्रिंट पोथी की वेबसाइट पर उपलब्ध होगी। किसी भी शंका अथवा जिज्ञासा हेतु संपर्क कीजिए: वर्जिन साहित्यपीठ 9971275250

लघुकथा मंजूषा 5 - चयनित लघुकथाकारों की सूची

वर्जिन साहित्यपीठ सभी लेखक मित्रों का आभारी है कि उन्होंने लघुकथा मंजूषा 5 हेतु अपनी लघुकथाएँ भेजकर इस आयोजन की सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सीमाओं के चलते सभी लघुकथाएं इसमें शामिल नहीं हो पाई हैं, जिसका हमें खेद है। चयनित लघुकथाकारों की सूची इस प्रकार है: उपेंद्र सिंह भारती कुमारी डॉ प्रदीप उपाध्याय अर्चना राय लक्ष्मी मित्तल नीलम पारीक सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा सुषमा सिंह चुंडावत राजकुमार कान्दू अंजना छलोत्रे मीना सूद मृणाल आशुतोष ममता शुक्ला हरदीप सबरवाल कनक हरलालका डॉ चंद्रेश कुमार छतलानी विजयानन्द विजय सुषमा तिवारी सतीश राठी ललित मिश्र मंजू शर्मा अन्य अपडेट हेतु ब्लॉग को सब्सक्राइब अवश्य कीजिए। किसी भी जिज्ञासा अथवा शंका समाधान हेतु संपर्क कीजिए वर्जिन साहित्यपीठ 9971275250

लॉकडाउन (ललित मिश्र)

तुम्हारी पोस्ट देख लिया करता हूँ मैं फिर से उमंगें भर लिया करता हूँ एक-एक शब्द में डूब जाता हूँ तुम्हारी यात्रा पर मैं अकसर निकल लिया करता हूँ तुम्हें सुनने का जब जब मन करता है अपनी धड़कनों को सुन लिया करता हूँ लाइक करूँ तो तुम्हारा स्पर्श महसूस होता है दिल छूता हूँ तो मुस्कुरा लिया करता हूँ मुझे नहीं निकलना है तुम्हारे लॉकडाउन से कभी मैं हर बार लॉकडाउन बढ़ा लिया करता हूँ

लघुकथा मंजूषा - 5 हेतु लघुकथाएं आमंत्रित हैं।

(पुस्तक पेपरबैक और ईबुक, दोनों रूपों में प्रकाशित की जाएगी।) रॉयल्टी: 50% लेखकगण + 30% संपादन मंडल + 20% साहित्यपीठ (पहली 10 प्रति की बिक्री साहित्यपीठ के पास रहेगी)। रॉयल्टी 11वीं प्रति की बिक्री से प्रारंभ होगी। सेल रिपोर्ट: पारदर्शिता हेतु गूगल, पोथी और अमेज़न की सेल रिपोर्ट यहीं वर्जिन साहित्यपीठ के फेसबुक पेज और ग्रुप तथा ब्लॉग पर प्रति माह के प्रथम सप्ताह में शेयर की जाएगी। नमस्कार मित्रों। सार्थक लेखन हेतु सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। निमंत्रण: लघुकथा मंजूषा  - 1, 2, 3 एवं 4 की सफलता के पश्चात वर्जिन साहित्यपीठ लघुकथाकारों  से लघुकथा मंजूषा - 5 हेतु लघुकथाएं आमंत्रित करता है। आप अपनी प्रकाशित/अप्रकाशित 2 बेहतरीन लघुकथाएं virginsahityapeeth@gmail.com पर भेज दें।  सब्जेक्ट में "लघुकथा मंजूषा - 5, 2020 हेतु" अवश्य लिखें। संपादक के लिए: जो संपादक मित्र इस संकलन से जुड़ना चाहते हैं वे अंत में दिए 9971275250 पर सम्पर्क कर सकते हैं। प्लेटफॉर्म: ईबुक अमेज़न, गूगल प्ले स्टोर, और गूगल बुक्स के साथ सभी प्रमुख अंतरराष्ट्रीय डिजिटल लाइब्रेरी में उपलब्ध होगी जबकि पेपरब...

एच के जोशी जी के उपन्यास 'मेरी यादों के झरोखों से' का अंश

...मधु फोन पर किशोर से बात करती रही वह भूल चुकी थी किवह आँचलपुर में किशोर के घर आई हुई है,समय इतनी तेजी से दौड़ता है मानो किसी से स्पर्द्धा हो,और सच तो बात यह है कि जहाँ प्रेम की चर्चा होती है वहाँ समय क्या कई शताब्दियों का समय भी कम है प्रेम की चर्चा करने में।यही स्तिथि हो गई थी मधु की,वह फोन पर बात करती जारही थी हर प्रश्न और उनके उत्तर स्वतःदोनो के ओर से बेरोक टोक आदान प्रदान होरहे थे,अतः कब समय गुजरा पता ही नही चला। दीदी घर नही चलोगी।चन्द्रा बोली। चलेंगे जरा थोड़ी देर बात कर लेने दे।मधु ने चन्द्रा को जबाब दिया। क्या  कह रही हो।दूसरी ओर से किशोर ने उससे पूछा। जी...वह चन्द्रा साथ है उसे बोला था मैंने।मधु बोली। चन्द्रा ड्राईंग रूम से वाहर आचुकी थी माजी के कहने पर मानिसि और चन्द्रा दोनो घरेलू काम मे ब्यस्त होगई आज वैसे भी दीपावली का त्यौहार मनाया जा रहा था चारो ओर खुशियों का वातावरण था।धीरे धीरे दिन छुप गया ,मांजी ने आकर ड्रायगरूम की लाइट आन की मधु ने झिझकते हुए फोन आहिस्ता से रख दिया। ओ माई गॉड....।इतना समय बीत गया।मधु के मुहँ से स्वता निकला। कोई बात नही बेटी।चलो अब फ्रेस हो ल...

संतोष श्रीवास्तव की कविताएँ

आंदोलिता हवाएँ -------------------- ये आंदोलिता हवाएँ टिकने न देंगी मोम पर जलती, थरथराती लौ अंधेरे से निपटने की तमाम कोशिशें नाकाम करने पर उतारू इन हवाओं का नहीं कोई ठिकाना गुज़रती जा रही हैं कुसुम दल से, डालियों से, झील के विस्तार को झकझोरती मोम के आगोश में लौ का बुझता, मरता अस्तित्व पर यह उतना आसान भी न था सम्हाल रखा है एक आतुर प्रण लिए तरल मोम ने बूँद सी लौ को लड़ने की पूरी ताकत से एक आंदोलन हवा के खिलाफ वहाँ भी तो था ****** आर्त्त पुकार ++++++++ मैंने अरमानों के कुछ बीज अपनी मुट्ठी में दबा रखे हैं और आतुरता से प्रतीक्षा कर रही हूं मौसम की दस्तक का चारों ओर नि:शब्द सन्नाटा है पानी की एक बूंद तक नहीं आषाढ़, सावन,भादो भरोसा दिलाते रहे कहीं धुनके हुए कहीं सिलेटी बादलों से हवा संग छितराते रहे पर बरसे नहीं सूखी, पपड़ाई धरती करती रही प्रतीक्षा अपने प्रियतम बादलों के बरसने का कोख में दबे बीजों के झुलस जाने की आशंका धरती का कलेजा कर रही चूर चूर आता तो रहा है अब तक मौसम सिलसिलेवार इस बार क्या हुआ मौसम की आवाजाही को बूढ़ी धरती ...

प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव विदग्ध की कविताएँ

१ ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये ये मन ध्यान प्रभु का भुलाने न पाये । शिथिलता कहीं कोई आने न पाये ।। बड़ी ही प्रबल हैं विषय वासनायें सदा अपने चंगुल में मन को फसाँये । वही बच सके जो रहे साफ निश्छल औ प्रभु की कृपा से गये जो बचाये ।।१।। यहाँ मोहमाया ने सबको भुलाया न कोई समय पर कभी काम आया । हरेक रास्ते में है धोखे हजारों सदा कर्म अपने ही बस काम आये ।।२।। है दुनियाँ पुरानी मगर अजनबी है कभी कुछ है लेकिन अलग कुछ कभी है । बदलती रही सदा ये अपनी चालें करेगी ये कल फिर कोई क्या बताये ?३।। है बस अपना खुद का औ प्रभु का सहारा न ऐसा कोई जो कभी न हो हारा। थके हारे मन को मिली चेतना नई तभी जब भी  भगवान ने पथ दिखाये ।।४।। सदा ध्यान से शुध्दता मन ने पाई यही शुध्दता ही है सच्ची कमाई । सदा ज्योति बन आये भगवान आगे कि निष्पाप मन से गये जब बुलाये ।।५।। २   नेताओं से... देश सेवा परम उच्च आदर्श है लोगों ने जानें तक दी हैं इसके लिये। सोचिये आज क्या कर रहे आप हैं यह उठापटक है सारी किसके लिये ? देश सेवा में मन है तो उसके लिये किसी कुर्सी या पद की जर...

रेखा तोमर की कहानी

ऑक्सीजन रात की बची सब्जी भरकर परांठा बनाया, रोल बनाकर मुँह में जल्दी जल्दी निगलने लगी, पापा की बात याद आई"बेटा खाना चबा चबा कर खाया करो, जल्दी पचता है" लेकिन अब जिंदगी इतनी जल्दबाजी में है कि खाना पचाने की फुर्सत किसे है? देखा जाए तो इस समय खाने से ज्यादा जरूरत तो दवाइयों की पड़ती है, वो बिस्तर पर लेटे हुए मुझे ही देख रहे थे "फिर कहीं खो गई"? "उम्मम, नही ऐसे ही" "उमा, तुम पर बोझ बनकर रह गया हूँ" आशीष के मुँह से निकली यही बात मेरे हृदय में शूल सी चुभती है, आंसुओ की धार रोकते रोकते भी  बह निकली। उनका हाथ कस कर दोनो हाथों के बीच थामा और बोली"मेरी लाइफ हो तुम, ये सब बोलकर मेरे प्यार का मज़ाक क्यो उड़ाते हो?तुमने पूरे समाज से लड़ कर मुझसे शादी की..मैं तुम्हारे लिए इन हालातों से नही लड़ सकती"? "बिल्कुल लड़ सकती हो, मेरी शेरनी हो तुम" उनके माथे पर चुम्बन दे मैं निकल पड़ी अपनी उस सस्ती सी जॉब पर जहाँ लोगो के ईमान उससे भी सस्ते है लव मैरिज की है तो परिवार सहायता के लिए साफ मना कर चुका, इनके परिवार के अनुसार मुझसे शादी की इ...

राजनन्दिनी रावत की कविताएँ

(1)  चयन बलात्कार पर बात करने के लिए हम बलात्कार की ताजा ख़बर का इंतजार करते हैं जब कोई बेटी सो जाती हैं तब देश जागता हैं हमें इतिहास में पद्मावती को पढ़ाया हैं पद्मावती के जौहर को पढ़ाया जाता हैं हम नहीं सोचते पद्मावती के पास इतना समय तो था कि वो जौहर कर सकी पर साधारण स्त्री के पास तो इतना भी समय नहीं होता... हम नहीं सोचते कि एक औरत खुद को आग में झोंक देने को तैयार हैं पर आदमी की मानसिकता वो औरत को छोड़ना ही नहीं चाहता हम स्त्री की अस्मत को शरीर से जोड़ लेते हैं और अस्मत को स्त्री के स्वाभिमान से जो सही भी हैं लेकिन क्या अस्मत लूट ली जाने वाली चीज़ हैं??? मैं सोचती हुँ कि यदि ऐसा शण आ जाए तो औरत को क्या होना चाहिए??? पद्मावती या फूलन देवी...! मैं सोचती हूँ कि ऐसे शण में औरत को पद्मावती होना चाहिए क्योंकि वो सिर्फ शरीर नहीं नोंचते वो रूह तक को नोच देते हैं.... पर एक साधारण स्त्री के पास तो इतना भी समय नहीं होता... कि वो जौहर कर सके !!! (2)  समझदार लड़कियाँ प्रेम में पड़ जाती हैं अक्सर समझदार लड़कियाँ वही समझदार लड़कियाँ जो आती हैं अव्वल अप...

सारिका भूषण की कविताएँ

1. समुद्र  ------- एकटक निहार रही थी लहरों को बन एक शून्य शून्य तक निहार रही थी दूर दिखती लहरें अब पास दिख रही थी लहरों के वेग देख पहले डरी - डरी थी पर अब खड़ी थी सामना करने को तैयार क्योंकि अब पाँव जमा चुकी थी रेत की ज़मीन पर बेख़ौफ़ निर्विकार होकर । लहरें टकराकर लौट रही थीं पैरों तले ज़मीन भी सरकती जा रही थी हिल जा रही थी मैं मगर मेरे इरादों को गिरना मंजूर नहीं था । 2. मृगनयनी -------------- हां ! मृगनयनी थी वह उसकी बड़ी - बड़ी आँखें और आंखों से बोलती वह भाषा का तो पता नहीं पर उन गहरी आंखों में अकुलाते सपने मुझे बहुत दिखे थे । हां ! मृगनयनी थी वह मचलती थीं उसकी चंचल पुतलियां और पुतलियों में थी एक अजीब सी चमक जो उसे औरों से अलग बता रहे थे । हां ! मृगनयनी थी वह उसके श्यामल चेहरे पर आंखों के सामने गिरते काले ,घुंघराले और उलझे केश मेरे न चाहते हुए भी मुझे और कुछ लफंगों को उलझाते ही जा रहे थे । हां ! उसी मृगनयनी को जिसके कांधे पर लटक रहा था मटमैला झोला और झोले से हुलक रहे थे रास्ते से चुने हुए कचरे जो उसके लिए रोटी ...

डॉ. तरुणा दाधीच की लघुकथाएँ

1-  हिस्से का समय       ओ...ओ..ओ....गाते हुए और घुटने को हिला रही सृष्टि की नजर फोन पर गढ़ी थी और दोनों हाथों से मैसेज टाईप करने में इतनी व्यस्त हो गई की गोद में सो रही नीरा को भूल ही गयी।ऐसा अक्सर होता रहता, व्यस्त दिनचर्या के कारण सृष्टि परिवार और दोस्तों से थोड़ा कट सी गयी थी, तो जब बच्ची को सुलाने आती तब फोन को देखना उसके लिए तय कार्य रहता।सृष्टि की नज़र जब नीरा पर पड़ी तो स्फारित नेत्रों से मानो कुछ प्रश्न कर रही उसे अनिमेष देख रही थी, सृष्टि ने आँखें दिखाकर सुलाना चाहा पर बहुत देर तक जगी रही।अगले दिन फिर वही देख सृष्टि ने कुछ विचार कर फोन को एक ओर रख उसे थपथपाने लगी।सृष्टि अवाक् थी, देर तक सोने वाली नीरा आज इतना जल्दी सो गई,जब उसने देखा नीरा के चेहरे पर  संतुष्टि का भाव और छोटे से होंठों पर लम्बी सी मुस्कान है, सृष्टि को समझते देर नहीं लगी कि वह उसका सारा ध्यान स्वयं पर चाहती थी।आज जब नीरा को सुलाने गयी तो ,नीरा ने बिना विलम्ब किये फोन पर चल रहे हाथ को पकड़कर अपने ऊपर रख लिया और करुण नेत्रों से उसे देखने लगी,मानो पूछ रही हो ,मेरी क्या गलती हैं जो आप मेर...

भावना ठाकर की कहानी

कश्मकश ज़िंदगी की क्यूँ कभी-कभी लगता है ज़िंदगी खूबसूरत भी है ओर नासूर भी पता नहीं क्यूँ मैं इतनी अनमनी सी रहती हूँ सबकुछ तो है फिर भी एक कमी सी कचोटती है, वैसे भूल जाना चाहिए मुझे बीते कल को हथेलियों पर लिए फिरती हूँ, पर क्या पहले प्यार को भूल जाना इतना आसान होता है दिल में एक ही रंजिश पलती है सालों से एक सवाल लिए वो क्यूँ नहीं आया। काश कहीं वो एक बार मिल जाए तो पूछ लूँ उसे जो आज मेरी इस उखड़ी- उखड़ी सोच का ज़िम्मेदार है, मेरे खयालों की रफ़्तार को तोड़ती कुणाल की आवाज़ ने चौंका दिया रिया आज रात नये बोस की ज्वाईनिंग की खुशी में होटेल होलीडे इन में पार्टी है, ओर हाँ तुम्हें वो रेड साड़ी पहनकर आना है, आज पहली बार ऑफ़िशियल पार्टी में सबको विद फैमिली बुलाया है.!  तुम देखना बंदे की मल्लिका को देखकर जलन होगी आज मेरे सारे कलिगस को, पर मैंने टालने की कोशिश में कुणाल से कहा प्लीज़ हो सके तो तुम अकेले चले जाओ मुझे बख़्श दो मैं आदी नहीं एसी पार्टीस की.! एसी पार्टीयों में लेड़ीज़ की फ़ालतू की फ़ेशन कंपिटीशन होती है, एक दूसरे से स्मार्ट दिखने की बचकानी हरकतें, ओर तुम जेन्टस लोगो...

शिखा सिंह भारद्वाज की कविताएँ

(1) फिर भी मैं परायी हूँ बहू.... ओ बहू..... सुन तो जरा मेरे कमरे में से चश्मा तो लाना, जी.... माँ जी... क्षण बीते फिर सुनती हूं मैं बहू.... ओ बहू..... सुन.... दो कप चाय बना ला उसके साथ पकौड़े भी तल लें.. वो भी गोभी के जी..... माँ जी..... वक्त का पहिया घूमे जैसे वैसे मैं भी घूमा करती बहू.... ओ बहू..... सुन तो..... रागनी के काॅलेज जाने का वक्त हो चुका है उसे अपना लाल वाला पर्स तो दे दे। जी..... माँ जी....... मेरे किस्मत की क्या यही नीति है?... या हर बहू की यही रीति है... बहू .... ओ बहू..... 'राहुल के पापा आए हैं ' उनके लिए खाना तो लाकर दे दे। जी.... माँ जी.... मुझे मेरे घर से यही सीख मिली हैं सास-ससुर माँ और पिता से बढ़कर है... बहू.... ओ बहू..... स्कूल की छुट्टी हो गई होगी बस आ गई होगी जा बच्चों को ले आ जी..... माँ जी.... कहाँ थी पहले, अब कहाँ खड़ी हूँ ये सोच-सोच खुद से डरी हूँ बहू.... ओ बहू..... सुन.... रात के खाने पर राहुल की मौसी आ रही है खाना थोड़ा चटपटा बनाना रायता, गोभी के पराठे, गाजर का हलवा, धनिए की चटनी और... जो त...

विजय विभोर की लघुकथाएँ

१. कुत्ता कुत्ते -------------------------- नन्ही पिंकी को ट्यूशन पर हमेशा दादी जी या मम्मी ही छोड़ने जाती थीं| लेकिन आज दोनों ही घर पर नहीं थीं| ट्यूशन का टाइम हुआ तो पिंकी ने अपना बस्ता उठाया और ट्यूशन के लिए निकल ली| झबरु ने उसे जाता देखा तो दबे पाँव उसके पीछे-पीछे हो लिया| रास्ते में कुछ लालची निगाहों ने देखा कि पिंकी आज अकेली ही चली आ रही है। लेकिन वे नज़रें झबरू को नहीं देख सकी। पिंकी अपनी मस्ती में चल रही थी इसलिए उसको भी पता नहीं चला कि उसके पीछे कौन आ रहा है, कौन नहीं| पिंकी ट्यूशन सैंटर के अंदर पहुँची तो झबरु भी वापिस घर की तरफ हो लिया, क्यूंकि घर पर कोई था नहीं| ट्यूटर ने आज दस मिनिट पहले ही क्लास खत्म कर दी| पिंकी अपने घर की तरफ निकली तो वे भूखी-लालची निगाहें अपनी दो टाँगों के सहारे उसके पीछे लग गयी। जैसे ही उन्होंने गलत इरादे से पिंकी पर हाथ डालने की कोशिश की तभी दूर से भौंकता/दौड़ता हुआ झबरु उन्हें पिंकी की तरफ आता दिखाई पड़ा। अपने प्रति किसी अनहोनी की आशंका से उस वक्त उन्होंने अपनी जान बचाकर भागने में ही भलाई समझी| २. तारों की छाँव ------------------...

मंजुलतारा निःशुल्क पुस्तक प्रकाशन योजना

प्रतियोगिता के परिणाम

नमस्कार मित्रवर प्रतियोगिता के परिणाम घोषित किए जा रहे हैं। विजेता के लिए जो अंक निर्धारित किए गए थे, उतने अंक कोई भी रचना अर्जित नहीं कर पाई।

इस बार भी दीवाली यूँ ही मनाओगे!

ललित कुमार मिश्र लड़ियों और दीयों से ज्यादा जगमगाती है जब किसी के चेहरे पर मुस्कान आती है तो इस बार भी दीवाली क्या यूँ ही मनाओगे बताओ न! कितने चेहरों पर मुस्कान लाओगे? पटाखों से ज्यादा रोमांचित करता है जब किसी की आँखों में सपना पलता है तो इस बार भी दीवाली में शोर ही मचाओगे बताओ न! कितनों को उत्साहित कर पाओगे? ये दीये, पटाखे बस कुछ दिन चलेंगे फिर ये अगले साल ही मिलेंगे तो इस बार भी दीवाली कुछ दिन ही मनाओगे बताओ न! कितने घर रोशन कर पाओगे?

शायद कोई पागल रहा होगा !

गौरव भारती एक अधेड़ इंसान लंगड़ाते हुए चल रहा था चलते चलते रुक रहा था लगा रहा था हिसाब अपनी गंदी, लंबी सिकुड़ी उँगलियों पर न जाने किस चीज का मैंने रूककर पूछा - ‘क्या गिन रहे हो’ उसने मुझे ऊपर से नीचे तक टटोला मेरी खद्दर झोली पर आँख गड़ाए मुँह चबाते हुए बोला - ‘दिखता नहीं क्या सड़क नाप रहा हूँ दूर-दूर तक फैली सड़क लंबी-चौड़ी सड़क रोज नापता हूँ मेरे साथ नापोगे तुम भी रहने दो तुमसे न होगा’ मैले, बेतरतीब बाल खुजाते हुए रूककर उसने एक सवाल पूछा - लेखक हो क्या? मैंने हँसकर कहा - ‘हां, लिख लेता हूँ, कोशिश में हूँ लेकिन तुमने कैसे पता लगाया’ सवाल काटते हुए उसने फिर पूछा - ‘किस जमात के लेखक हो? मने किसके लिए लिखते हो? कौन-सा झंडा?’ अकबकाते हुए मैंने कहा - ‘सबके लिए लिखता हूँ लेखक हूँ, नेता नहीं’ उसने हँसते हुए कहा - ‘फिर दो कौड़ी के लेखक हो तुम चलो, मेरी तरह सड़क नापोगे? बहुत मजा आएगा’ ‘मैं चिढ गया थोड़ा खुद को सँभालते हुए उम्मीद की मोमबत्ती जलाई और बोला - ‘एक दिन मुझे पढ़ा जाएगा तुम देख लेना अच्छे पाठक जिन्दा हैं अभ...